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ये है नई धारा संवाद पॉडकास्ट। ये श्रृंखला नई धारा की वीडियो साक्षात्कार श्रृंखला का ऑडियो वर्जन है। इस पॉडकास्ट में हम मिलेंगे हिंदी साहित्य जगत के सुप्रसिद्ध रचनाकारों से। सीजन 1 में हमारे सूत्रधार होंगे वरुण ग्रोवर, हिमांशु बाजपेयी और मनमीत नारंग और हमारे अतिथि होंगे डॉ प्रेम जनमेजय, राजेश जोशी, डॉ देवशंकर नवीन, डॉ श्यौराज सिंह 'बेचैन', मृणाल पाण्डे, उषा किरण खान, मधुसूदन आनन्द, चित्रा मुद्गल, डॉ अशोक चक्रधर तथा शिवमूर्ति। सुनिए संवाद पॉडकास्ट, हर दूसरे बुधवार। Welcome to Nayi Dhara Samvaa ...
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Here I recite Hindi poems written by me and some of my favorite, all-time classics. इस पॉडकास्ट के माध्यम से मैं स्वरचित रचनाएँ और अपने प्रिय कवियों की कालजयी कवितायेँ प्रस्तुत कर रहा हूँ Three times "Author Of The Month" on StoryMirror in 2021. Open to collaborating with music composers and singers. Write to me on HindiPoemsByVivek@gmail.com #Hindi #Poetry #Shayri #Kavita #HindiPoetry #Ghazal
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यहाँ हम सुनेंगे कविताएं – पेड़ों, पक्षियों, तितलियों, बादलों, नदियों, पहाड़ों और जंगलों पर – इस उम्मीद में कि हम ‘प्रकृति’ और ‘कविता’ दोनों से दोबारा दोस्ती कर सकें। एक हिन्दी कविता और कुछ विचार, हर दूसरे शनिवार... Listening to birds, butterflies, clouds, rivers, mountains, trees, and jungles - through poetry that helps us connect back to nature, both outside and within. A Hindi poem and some reflections, every alternate Saturday...
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Are you fascinated by the stories and mythology of ancient India? Do you want to learn more about the epic tale of Ramayana and its relevance to modern-day life? Then you should check out Ramayan Aaj Ke Liye, the ultimate podcast on Indian mythology and culture. Hosted by Kavita Paudwal, this podcast offers a deep dive into the world of Ramayana and its characters, themes, and teachings.
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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहां रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली सक्रिय गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कवितायेँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूहीं उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट श्रंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नयी कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुवात।
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बेली डान्‍सर - दिनेश कुमार शुक्ल बमाको शहर के खण्डहरों में मेरा जन्म हुआ माली के प्राचीन परास्त राजकुल में ... माँ के सूखते स्तनों से मिला मुझे मज्जा का स्वाद, जब गोद में ही थी मैं सुनी मैंने मृत्यु की पहली पदचाप क्षयग्रस्त माँ की मंद होती धड़कन में, गोद में ही लग गई लत मुझे जिन्दा बने रहने की सूखी हुई घास, कटीली नागफनी और ठुर्राई झाड़ियों की मिट्ट…
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अंतिम ऊँचाई - कुँवर नारायण कितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलब अगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं, हमारे चारों ओर नहीं। कितना आसान होता चलते चले जाना यदि केवल हम चलते होते बाक़ी सब रुका होता। मैंने अक्सर इस ऊलजलूल दुनिया को दस सिरों से सोचने और बीस हाथों से पाने की कोशिश में अपने लिए बेहद मुश्किल बना लिया है। शुरू-शुरू में सब यही चाहते हैं कि स…
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कितना अच्छा होता है - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना कितना अच्छा होता है एक-दूसरे को बिना जाने पास-पास होना और उस संगीत को सुनना जो धमनियों में बजता है, उन रंगों में नहा जाना जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं। शब्दों की खोज शुरू होते ही हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं और उनके पकड़ में आते ही एक-दूसरे के हाथों से मछली की तरह फिसल जाते हैं। हर जानकारी में बहुत गहरे ऊ…
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नई धारा संवाद पॉडकास्ट में आपका स्वागत है। यह एपिसोड हमारे यूट्यूब चैनल पर 21 अगस्त 2022 को प्रसारित हुआ था। इस एपिसोड में हमारी मुलाकात अंतरराष्ट्रीय बुकर सम्मान से सम्मानित लेखिका गीतांजलि श्री जी से हुई। इस साक्षात्कार में उनसे बातचीत की हमारे सूत्रधार मिहिर पंड्या ने। आइए सुनते हैं यह ख़ास बातचीत।…
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गिरना - नरेश सक्सेना चीज़ों के गिरने के नियम होते हैं! मनुष्यों के गिरने के कोई नियम नहीं होते। लेकिन चीज़ें कुछ भी तय नहीं कर सकतीं अपने गिरने के बारे में मनुष्य कर सकते हैं बचपन से ऐसी नसीहतें मिलती रहीं कि गिरना हो तो घर में गिरो बाहर मत गिरो यानी चिट्ठी में गिरो लिफ़ाफ़े में बचे रहो, यानी आँखों में गिरो चश्मे में बचे रहो, यानी शब्दों में बचे रह…
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किताब पढ़कर रोना - रघुवीर सहाय रोया हूँ मैं भी किताब पढ़कर के पर अब याद नहीं कि कौन-सी शायद वह कोई वृत्तांत था पात्र जिसके अनेक बनते थे चारों तरफ़ से मँडराते हुए आते थे पढ़ता जाता और रोता जाता था मैं क्षण-भर में सहसा पहचाना यह पढ़ता कुछ और हूँ रोता कुछ और हूँ दोनों जुड़ गए हैं पढ़ना किताब का और रोना मेरे व्यक्ति का लेकिन मैंने जो पढ़ा था उसे नहीं रो…
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तुम लिखो कविता | दामोदर खडसे तुम लिखो कविता और मैं देखूँ जी भरकर कलम, स्याही, कागज़ पर गुनगुनाता ज़िन्दगी का अनगाया गीत सफ़र के बहुत पीछे कोई गुमनाम मोड़ और इमली के पेड़ पर कटी हुई पतंग कबूतरों का जत्था, राह से उड़ती धूल मुड़-मुड़कर ठिठकते कदम लहराता हाथ कुछ-कुछ क़रीबी बहुत कुछ दूरियाँ भीतर-बाहर उतराते आँखों की डोरों में किए-अनकिए की उलझन आत्महंता सिसकन कैस…
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मैंने आहुति बन कर देखा - सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने? काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है, मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने? मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले? मैं कब कहता हूँ प्यार करूँ तो मुझे प्राप्…
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काश कि पहले लिखी जातीं ये कविताएँ - प्रियदर्शन एक वह एक उजली नाव थी जो गहरे आसमान में तैर रही थी चाँदनी की झिलमिल पतवार लेकर कोई तारा उसे खे रहा था आकाशगंगाएँ गहरी नींद में थीं अपनी सुदूर जमगग उपस्थिति से बेख़बर रात इतनी चमकदार थी कि काला आईना बन गई थी समय-समय नहीं था एक सम्मोहन था जिसमें जड़ा हुआ था यह सारा दृश्य यह प्रेम का पल था जिसका जादू टूटा …
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लौटना - विष्णु खरे उसे जहाँ छोड़ा था कभी-कभी वहाँ जाकर खड़ा हो जाता हूँ कूडे़ के जिस अम्बार को देख वह लपक कर दौड़ गया था अब वहाँ नहीं है दरअसल अब कुछ भी वहाँ उस दिन जैसा नहीं है मैंने उसे आधे दिल से पुकारा भी था कि अगर लौट आए तो उसे वापस ले जाऊँ लेकिन वह सिर्फ़ एक बार मेरी तरफ़ देख कर मुझे ऐसा लगा कि जैसे हँसता हुआ कूड़ा खोदने में जुटा रहा उसके बाद…
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प्रजापति - राजेश जोशी चीज़ों का हूबहू दिखना अपनी ही शक्ल में कविता में मुझे पसंद नहीं बिल्कुल मैं चाहता हूँ मेरा फटा-पुराना जूता भी दिखे वहाँ पूर्णिमा के पूरे चाँद की तरह एक साबुन की तरह दिखे मेरी आत्मा छोटी-छोटी विकृतियाँ और अंतर्विरोध भी दिखें वहाँ फूली हुई नसों वाले राक्षसों से इतने वीभत्स और दैत्याकार कि आसानी से की जा सके उनसे घृणा की जा सके न…
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कवि - वीरेन डंगवाल मैं ग्रीष्म की तेजस्विता हूँ और गुठली जैसा छिपा शहद का ऊष्म ताप मैं हूँ वसंत में सुखद अकेलापन जेब में गहरी पड़ी मूँगफली को छाँटकर चबाता फ़ुरसत से मैं चेकदार कपड़े की क़मीज़ हूँ उमड़ते हुए बादल जब रगड़ खाते हैं तब मैं उनका मुखर ग़ुस्सा हूँ इच्छाएँ आती हैं तरह-तरह के बाने धरे उनके पास मेरी हर ज़रूरत दर्ज है एक फ़ेहरिस्त में मेरी हर …
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अंगारे को तुमने छुआ - कन्हैयालाल नंदन अंगारे को तुमने छुआ और हाथ में फफोला नहीं हुआ इतनी-सी बात पर अंगारे पर तोहमत मत लगाओ ज़रा तह तक जाओ आग भी कभी-कभी आपद्धर्म निभाती है और जलने वाले की क्षमता देखकर जलाती हैद्वारा Nayi Dhara Radio
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मैं तुम्हें फिर मिलूँगी - अमृता प्रीतम मैं तुम्हें फिर मिलूँगी कहाँ? किस तरह? नहीं जानती शायद तुम्हारे तख़्ईल की चिंगारी बन कर तुम्हारी कैनवस पर उतरूँगी या शायद तुम्हारी कैनवस के ऊपर एक रहस्यमय रेखा बन कर ख़ामोश तुम्हें देखती रहूँगी या शायद सूरज की किरन बन कर तुम्हारे रंगों में घुलूँगी या रंगों की बाँहों में बैठ कर तुम्हारे कैनवस को पता नहीं कैसे-कह…
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संख्याएँ - नरेश सक्सेना शब्द तो आए बहुत बाद में सँख्याएँ हमारे साथ जन्म से ही हैं गर्भ में जब निर्माण हो रहा था हमारी हड्डियों का रक्तकणों और कोशिकाओं का साथ-साथ सँख्याएँ भी निर्मित होती जा रही थीं एक हमारी देह की इकाई की वो सँख्या है जिसमें समाहित हैं सारी सँख्याएँ दो आँखों में स्थित है दो तीन है उँगलियों के तीन जड़ों में हृदय के हिस्से हैं चार और…
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खिड़कियाँ - कुमार विकल जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं उनमें रहने वाले बच्चों का सूरज के साथ किस तरह का रिश्ता होता है? सूरज उन्हें उस अमीर मेहमान —सा लगता है जो किसी सुदूर शहर से कभी —कभार आता है एकाध दिन के लिए घर में रुकता है सारा वक्त माँ से हँस—हँस के बतियाता है और जाते समय उन सबकी मुठ्ठियों में कुछ रुपये ठूँस जाता है| जिन घरों में खिड़कियाँ…
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डेमोक्रेसी क्या होती है? - अशोक चक्रधर पार्क के कोने में घास के बिछौने पर लेटे-लेटे हम अपनी प्रियसी से पूछ बैठे— क्यों डियर! डेमोक्रेसी क्या होती है? वह बोलीं— तुम्हारे वादों जैसी होती है! इंतज़ार में, बहुत तड़पाती है, झूठ बोलती है सताती है, तुम तो आ भी जाते हो, ये कभी नहीं आती है! एक विद्वान से पूछा वह बोले— हमने राजनीति-शास्त्र सारा पढ़ मारा, डेम…
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नदियाँ - केदारनाथ सिंह वे हमें जानती हैं जैसे जानती हैं वे अपनी मछलियों की बेचैनी अपने तटों का तापमान जो कि हमीं हैं बस हमीं भूल गए हैं हमारे घर कभी उनका भी आना-जाना था उनकी नसों में बहता है पहाड़ों का खून जिसमे थोड़ा सा खून हमारा भी शामिल है और गरम-गरम दूध टपकता हुआ भूरे दरख्तों की छाल से पता लगा लो दरख्तों की छाल और हमारी त्वचा का गोत्र एक ही है पर…
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नई धारा संवाद पॉडकास्ट में आपका स्वागत है। यह एपिसोड हमारे यूट्यूब चैनल पर 7 अगस्त 2022 को प्रसारित हुआ था। इस एपिसोड में हमारी मुलाकात सुप्रसिद्ध नाटककार व नाट्य-निर्देशक रंजीत कपूर जी से हुई। इस साक्षात्कार में उनसे बातचीत की हमारे सूत्रधार अमिताभ श्रीवास्तव ने। आइए सुनते हैं यह ख़ास बातचीत।द्वारा Nayi Dhara Radio
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हो सकता है - अशोक वाजपेयी हो सकता है, इस बार हम असमय आ गए हों हर समय कुछ ना कुछ का अंत हो रहा होता है और उसी समय कुछ ना कुछ का आरंभ भी ऐसा लग सकता है कि अंत ही आरंभ है और आरंभ ही अंत है ठीक-ठीक समय तय कर पाना मुश्किल है क्योंकि हर आना अंत है, आरंभ भी जब मनुष्य अपने एकांत में विलप रहा होता है, तब हरितिमा बाहर खिलखिला रही होती है फूलों को कतई ख़बर नह…
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औरतें - रमाशंकर यादव विद्रोही कुछ औरतों ने अपनी इच्छा से कुएँ में कूदकर जान दी थी, ऐसा पुलिस के रिकार्डों में दर्ज है। और कुछ औरतें चिता में जलकर मरी थीं, ऐसा धर्म की किताबों में लिखा है। मैं कवि हूँ, कर्ता हूँ, क्या जल्दी है, मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित, दोनों को एक ही साथ औरतों की अदालत में तलब कर दूँगा, और बीच की सारी अदालतों को मंसूख कर दूँगा। …
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मरना है ये तो तय है - नरेश सक्सेना मरना है ये तो तय है पर कब और किसके हाथ यही संचय है जो है सबसे नज़दीक उसी से सबसे ज़्यादा भय है यह इतना बुरा समय है मरना है ये तो तय हैद्वारा Nayi Dhara Radio
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बस एक ख़्वाब कविता- प्रतिभा कटियार स्वर- शुबा सुभाष रावत पूरे शहर में तितलियां उड़ती फिर रही हैं. रंग बिरंगी तितलियां, छोटी बड़ी तितलियां. खूबसूरत तितलियां. आज शहर को अचानक क्या हो गया है? पूरा शहर तितलियों से भरा है. हर कोई तितलियों के पीछे भाग रहा है. भागता ही जा रहा है. कोई छोटी तितली के पीछे भाग रहा है, कोई बड़ी तितली के पीछे. न कोई गाड़ी, न बस,…
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एक वृक्ष की हत्या - कुँवर नारायण अबकी घर लौटा तो देखा वह नहीं था— वही बूढ़ा चौकीदार वृक्ष जो हमेशा मिलता था घर के दरवाज़े पर तैनात। पुराने चमड़े का बना उसका शरीर वही सख़्त जान झुर्रियोंदार खुरदुरा तना मैला-कुचैला, राइफ़िल-सी एक सूखी डाल, एक पगड़ी फूल पत्तीदार, पाँवों में फटा-पुराना जूता चरमराता लेकिन अक्खड़ बल-बूता धूप में बारिश में गर्मी में सर्दी…
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इतने भले नहीं बन जाना साथी - वीरेन डंगवाल इतने भले नहीं बन जाना साथी जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कूवत सारी प्रतिभा किसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया ऐसा भी जिया जीवन तो क्या जिया? इतने दुर्गम मत बन जाना संभव ही रह जाए न तुम तक कोई राह बनाना अपने ऊँचे सन्नाटे में सर धुनते रह गए लेकिन किंचित भी जीवन का मर…
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जो तुम आ जाते एक बार - महादेवी वर्मा जो तुम आ जाते एक बार कितनी करुणा कितने सँदेश, पथ में बिछ जाते बन पराग, गाता प्राणों का तार-तार अनुराग-भरा उन्माद-राग; आँसू लेते वे पद पखार ! जो तुम आ जाते एक बार ! हँस उठते पल में आर्द्र नयन घुल जाता ओठों से विषाद, छा जाता जीवन में वसंत लुट जाता चिर-संचित विराग; आँखें देतीं सर्वस्व वार | जो तुम आ जाते एक बार !…
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पिता - उदय प्रकाश पिता झाड़-झंखाड़, घाटियों और पत्थरों से भरे चटियल मैदान थे। पिता सागौन, शीशम, बबूल, तेंदुओं और हिरनों से भरे बीहड़ थे। बचपन में अक्सर किसी ऊँचे टीले पर चढ़ कर मैं आस-पास के गाँवों में ललकार दिया करता था नाके के पार शहर तक में पिता का रोब था। एक-एक इमारत पर उनकी कन्नियाँ सरकी थीं। एक-एक दीवार पर उनकी उँगलियों के निशान थे। हर दरवाज़…
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यूँ सफ़र भर याद हैं - शिवराज सिंह बेचैन यूँ सफ़र भर याद हैं गुज़रे मुक़ामातों के लोग मेरी मजबूती तो हैं कमज़ोर हालातों के लोग दोस्त-दुश्मन, ग़ैर-अपने पास से देखे सभी यूँ तो इन्सां ही हैं आख़िर सब धर्म-जातों के लोग मैं कई सदियों से यूँ ख़ामोश था, संतप्त था मेरी जानिब से बहुत बोलें हैं बेबातों के लोग बात मंज़िल की तो करने का कोई मतलब नहीं ये तजुर्बात-ए-सफ़र ले…
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तोते का जुठाया अमरूद दो मुझे जिसके भीतर की लामिला फूटती हो बाहर गिलहरी के दाँतों के दागवाला जामुन दो काला अंधकार के रस से भरा हुआ पक कर अपने ही उल्‍लास से फटता एक फल दो शरीफे का और रस के तेज वेग से जिस ईख के फटे हों पोर वह ईख दो मुझे और खूब चौड़े थन वाली गाय का दूध जिसके चलने भर से छीमियों से झरता हो दूध मुझे छप्‍पन व्‍यंजन नहीं बस एक फल दो सूर्य क…
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आम्रपाली - अनामिका था आम्रपाली का घर मेरी ननिहाल के उत्तर ! आज भी हर पूनो की रात खाली कटोरा लिए हाथ गुज़रती है वैशाली के खण्डहरों से बौद्धभिक्षुणी आम्रपाली । अगल-बगल नहीं देखती, चलती है सीधी मानो ख़ुद से बातें करती शरदकाल में जैसे (कमण्डल-वमण्डल बनाने की ख़ातिर) पकने को छोड़ दी जाती है लतर में ही लौकी पक रही है मेरी हर मांसपेशी, खदर-बदर है मेरे भीत…
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कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया साहिर उस दौर के शायर थे जब शायरी ग़म-ए-जानाँ तक न सिमट ग़म-ए-दौराँ की बात करने लगी थी। इस ग़ज़ल का मतला भी ऐसा ही है जो न सिर्फ खुद के गम पर हालात के गम का ज़किर भी करता है। आज इसी ग़ज़ल में कुछ और अशआर जोड़ने की हिमाकत की है। मुलाइज़ा फरमाइयेगा। --- Send in a voice message: https://podc…
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अपने घर की तलाश में - निर्मला पुतुल अंदर समेटे पूरा का पूरा घर मैं बिखरी हूँ पूरे घर में पर यह घर मेरा नहीं है बरामदे पर खेलते बच्चे मेरे हैं घर के बाहर लगी नेम-प्लेट मेरे पति की है मैं धरती नहीं पूरी धरती होती है मेरे अंदर पर यह नहीं होती मेरे लिए कहीं कोई घर नहीं होता मेरा बल्कि मैं होती हूँ स्वयं एक घर जहाँ रहते हैं लोग निर्लिप्त गर्भ से लेकर बि…
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कुछ लोगों के नामो का उल्लेख किया गया था जिनके ओहदे थे बाकी सब इत्यादि थे इत्यादि तादात में हमेशा ही ज्यादा होते थे इत्यादि भाव ताव कर के सब्जी खरीदते थे और खाना वाना खा कर खास लोगों के भाषण सुनने जाते थे इत्यादि हर गोष्ठियों में उपस्थिति बढ़ाते थे इत्यादि जुलूस में जाते थे तख्तियां उठाते थे नारे लगाते थे इत्यादि लम्बी लाइनों में लग कर मतदान करते थे …
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मल्लिकार्जुन मंसूर - अशोक वाजपेयी मल्लिकार्जुन मंसूर अपने भरे पर फिर भी सीधे बुढ़ापे में हलका -सा झुककर रखते हैं कल के कंधे पर पर अपना हाथ ठिठककर सुलगाते हैं अपनी बीड़ी चल पड़ते हैं फिर किसी अप्रत्‍याशित पड़ाव की ओर अपने लिए कुछ नहीं बटोरते उनके संत-हाथ सिर्फ लुटाते चलते हैं सब कुछ गुनगुनाते चलते हैं पंखुरी-पंखुरी सारा संसार ईश्‍वर आ रहा होता घूमने…
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नई धारा संवाद पॉडकास्ट में आपका स्वागत है। यह एपिसोड हमारे यूट्यूब चैनल पर 24 जुलाई 2022 को प्रसारित हुआ था। इस एपिसोड में हमारी मुलाकात सुप्रसिद्ध लेखिका अलका सरावगी जी से हुई। इस साक्षात्कार में उनसे बातचीत की हमारी सूत्रधार चंद्र प्रभा ने। आइए सुनते हैं यह ख़ास बातचीत।द्वारा Nayi Dhara Radio
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तू आग थी मैं आब था न तू ग़लत न मैं ग़लत। तू ज़िन्दगी मैं ख़्वाब था न तू ग़लत न मैं ग़लत। उधर भी आग थी लगी इधर भी जोश था चढ़ा, नया नया शबाब था न तू ग़लत न मैं ग़लत। जो सुर्ख़ प्यार का निशाँ तिरी निगाह में रोज था, मिरे लिये गुलाब था न तू ग़लत न मैं ग़लत। ख़मोश लब तिरे रहे हमेशा उस सवाल पर, वही तिरा जवाब था न तू ग़लत न मैं ग़लत। ख़ुशी व ग़म का बाँटना मिरे…
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सैनिक पति के प्रति - कल्याणी सेन तुम फ़ौजी वर्दी में सजे हुए घर आये और तुमने अपनी माँ से कहा - कल सुबह चला जाऊँगा पता नहीं बन्दूक, राइफ़लों के जंगल से कब लौट कर आऊँगा तो मैंने लाल फूलों की माला तुम्हें नहीं पहनाई मैंने चन्दन तिलक तुम्हें नहीं लगाया नहीं की तुम्हारी आरती-वंदना या तुम्हारे सकुशल लौट आने की पूजा और प्रार्थना बिना पते-ठिकाने की आती हैं त…
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चैत की चौपही - दिनेश कुमार शुक्ल दिन नेवर्तों के महीना चैत का है पड़ चले फीके मगर रह-रह दहकते हैं अभी तक रंग होली के हवा के तेवर जरा बदले हुए हैं और गाढ़ी हो चली है धूप फसल के पकने का मौसम आ गया पर लॉक अब तक हरी है इस बार भुस तो बहुत होगा किन्तु दाने कम पड़ेंगे बालियों में मगर कोई क्या करे! दिन नेवर्तों के महीना चैत का है चौपही में सज सँवर कर स्वाँ…
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बहामुनी - निर्मला पुतुल तुम्हारे हाथों बने पत्तल पर भरते हैं पेट हज़ारों पर हज़ारों पत्तल भर नहीं पाते तुम्हारा पेट कैसी विडम्बना है कि ज़मीन पर बैठ बुनती हो चटाईयाँ और पंखा बनाते टपकता है तुम्हारे करियाये देह से टप....टप...पसीना...! क्या तुम्हें पता है कि जब कर रही होती हो तुम दातुन तब तक कर चुके होते हैं सैकड़ों भोजन-पानी तुम्हारे ही दातुन से मुँ…
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इस नए बसते इलाके में जहाँ रोज़ बन रहे हैं नये-नये मकान मैं अक्सर रास्ता भूल जाता हूँ धोखा दे जाते हैं पुराने निशान खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़ खोजता हूँ ढहा हुआ घर और ज़मीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बाएँ मुड़ना था मुझे फिर दो मकान बाद बिना रंग वाले लोहे के फाटक का घर था इकमंज़िला और मैं हर बार एक घर पीछे चल देता हूँ या दो घर आगे ठकमकाता यहाँ रोज़ कुछ…
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आने वालों से एक सवाल - भारतभूषण अग्रवाल तुम, जो आज से पूरे सौ वर्ष बाद मेरी कविताएँ पढ़ोगे तुम मेरी धरती की नई पौध के फूल तुम, जिनके लिए मेरा तन-मन खाद बनेगा तुम, जब मेरी इन रचनाओं को पढ़ोगे तो तुम्हें कैसा लगेगा : इस का मेरे मन में बड़ा कौतूहल है। बचपन में तुम्हें हिटलर और गांधी की कहानियाँ सुनाई जाएँगी उस एक व्यक्ति की जिसने अपने देशवासियों को मो…
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बेसन की सोंधी रोटी पर - निदा फ़ाज़ली बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ , याद आता है चौका-बासन, चिमटा फुँकनी जैसी माँ । बाँस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे , आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी माँ । चिड़ियों के चहकार में गूँजे राधा-मोहन अली-अली , मुर्गे की आवाज़ से खुलती, घर की कुंड़ी जैसी माँ । बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन थोड़ी-थोड़ी सी सब …
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आरा मशीन - विश्वनाथ-प्रसाद-तिवारी चल रही है वह इतने दर्प में कि चिनगारियाँ छिटकती हैं उससे दौड़े आ रहे हैं अगल-बगल के यूकिलिप्टस और हिमाचल के देवदारु उसके आतंक में खिंचे हुए दूर-दूर अमराइयों में पक्षियों का संगीत गायब हो गया है गुठलियाँ बाँझ हो गई हैं उसकी आवाज से मेरा छोटा बच्चा देख रहा है उसे कौतुक से कि कैसे चलती है वह कैसे अपने आप एक लकड़ी दूसर…
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बारिश - नेमिचंद्र जैन बारिश सुबह हुई थी जब फुहारों से नहाए थे पेड़ घर-द्वार बच्चे लोगों के मन और अब शाम को पश्चिम में रंगों का मेला भरा है लाल और सुनहरे की कितनी रंगते हैं ऊदे-साँवले बादलों को लपेटे कमरे में उमस के बावजूद बाहर हवा में सरसराहट है तरावट भरी छतों पर बच्चे नौजवान और अधेड़ भी पतंगें उड़ा रहे हैं चारों तरफ़ किलकारियाँ, खिलखिलाहट, भाग-दौड…
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पूरे चाँद के लिए मचलता है आधा समुद्र आधा चांद मांगता है पूरी रात पूरी रात के लिए मचलता है आधा समुद्र आधे चांद को मिलती है पूरी रात आधी पृथ्वी की पूरी रात आधी पृथ्वी के हिस्से में आता है पूरा सूर्य आधे से अधिक बहुत अधिक मेरी दुनिया के करोड़ों-करोड़ लोग आधे वस्त्रों से ढांकते हुए पूरा तन आधी चादर में फैलाते हुए पूरे पांव आधे भोजन से खींचते पूरी ताकत …
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'अच्छा लगा' - रामदरश मिश्र आज धरती पर झुका आकाश तो अच्छा लगा सिर किये ऊँचा खड़ी है घास तो अच्छा लगा आज फिर लौटा सलामत राम कोई अवध में हो गया पूरा कड़ा बनवास तो अच्छा लगा था पढ़ाया मांज कर बरतन घरों में रात-दिन हो गया बुधिया का बेटा पास तो अच्छा लगा लोग यों तो रोज़ ही आते रहे, आते रहे आज लेकिन आप आये पास तो अच्छा लगा क़त्ल, चोरी, रहज़नी व्यभिचार से …
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फूलन के लिए एक शोकगीत - मृणाल पाण्डे सिरहाने आहिस्ता बोलेंगे लोग, तेरे नहीं मीर के क्योंकि फूलन, बिना रोए-धोए तू बस टुक से सो गई तेरे सिरहाने पैताने बस अब एक शोर है नेता, अभिनेता, अंग्रेज़ी में गोद लेकर तुझे फ़ोटोजेनिक बनाने वाले, सबकी वन्स मोर, वन्स मोर है सिरहाने आहिस्ता बोलेंगे लोग, तेरे नहीं मीर के बीहड़ों के सतर्क साए सरका किए थे लगातार तेरी न…
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'एक लड़का' - इब्न-ए-इंशा एक छोटा-सा लड़का था मैं जिन दिनों एक मेले में पंहुचा हुमकता हुआ जी मचलता था एक-एक शै पर मगर जेब खाली थी कुछ मोल ले न सका लौट आया लिए हसरतें सैकड़ों एक छोटा-सा लड़का था मै जिन दिनों खै़र महरूमियों के वो दिन तो गए आज मेला लगा है इसी शान से आज चाहूं तो इक-इक दुकां मोल लूं आज चाहूं तो सारा जहां मोल लूं नारसाई का जी में धड़का कहा…
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'गाँधी' हो या 'ग़ालिब' हो - साहिर लुधियानवी 'गाँधी' हो या 'ग़ालिब' हो ख़त्म हुआ दोनों का जश्न आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न ख़त्म करो तहज़ीब की बात बंद करो कल्चर का शोर सत्य अहिंसा सब बकवास हम भी क़ातिल तुम भी चोर ख़त्म हुआ दोनों का जश्न आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न वो बस्ती वो गाँव ही क्या जिस में हरीजन हो आज़ाद वो क़स्बा वो शहर ही क्या जो न बने अहमदाबाद…
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विचार आते हैं - गजानन माधव मुक्तिबोध विचार आते हैं— लिखते समय नहीं, बोझ ढोते वक़्त पीठ पर सिर पर उठाते समय भार परिश्रम करत समय चाँद उगता है व पानी में झलमलाने लगता है हृदय के पानी में। विचार आते हैं लिखते समय नहीं, ...पत्थर ढोते वक़्त पीठ पर उठाते वक़्त बोझ साँप मारते समय पिछवाड़े बच्चों की नेकर फचीटते वक़्त!! पत्थर पहाड़ बन जाते हैं नक़्शे बनते है…
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