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Nayidhara Ekal

Nayi Dhara Radio

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साहित्य और रंगकर्म का संगम - नई धारा एकल। इस शृंखला में अभिनय जगत के प्रसिद्ध कलाकार, अपने प्रिय हिन्दी नाटकों और उनमें निभाए गए अपने किरदारों को याद करते हुए प्रस्तुत करते हैं उनके संवाद और उन किरदारों से जुड़े कुछ किस्से। हमारे विशिष्ट अतिथि हैं - लवलीन मिश्रा, सीमा भार्गव पाहवा, सौरभ शुक्ला, राजेंद्र गुप्ता, वीरेंद्र सक्सेना, गोविंद नामदेव, मनोज पाहवा, विपिन शर्मा, हिमानी शिवपुरी और ज़ाकिर हुसैन।
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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Skandgupt by Jai Shankar Prasad

Audio Pitara by Channel176 Productions

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मासिक
 
“Skandagupta" is a drama by the poet "Jaishankar Prasad". The play revolves around the historical figure Skandagupta, a "Gupta dynasty" emperor who ruled in ancient India. The play explores Skandagupta's challenges and commitment to upholding justice and righteousness through the dramatic narrative. The drama delves into themes of leadership, duty, and patriotism while also depicting the personal struggles and decisions faced by Skandagupta. Skandagupta" is a drama written by Hindi poet and ...
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लोकतंत्र से उम्मीद | मयंक असवाल एक देश की संसद को कीचड़ के बीचों बीच होना चाहिए ताकि अपने हर अभिभाषण के बाद संसद से निकलते ही एक राजनेता को पुल बनाना याद रहे। एक लोकतांत्रिक कविता को गाँव, मोहल्ले और शहर के हर चौराहे पर होना चाहिए ताकि जनता के बीच आजादी और तानाशाही का अंतर स्पष्ट रहें। एक लेखक को प्रतिपक्ष की कविता लिखने की समझ होनी चाहिए ताकि सिर्…
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चुप की साज़िश | अमृता प्रीतम रात ऊँघ रही है... किसी ने इनसान की छाती में सेंध लगायी है हर चोरी से भयानक यह सपनों की चोरी है। चोरों के निशान - हर देश के हर शहर की हर सड़क पर बैठे हैं पर कोई आँख देखती नहीं, न चौंकती है। सिर्फ़ एक कुत्ते की तरह एक जंजीर से बंधी किसी वक़्त किसी की कोई नज़्म भौंकती है।द्वारा Nayi Dhara Radio
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कविताएं | नरेश सक्सेना जैसे चिड़ियों की उड़ान में शामिल होते हैं पेड़ क्या कविताएँ होंगी मुसीबत में हमारे साथ? जैसे युद्ध में काम आए सैनिक की वर्दी और शस्त्रों के साथ खून में डूबी मिलती है उसके बच्चे की तस्वीर क्या कोई पंक्ति डूबेगी खून में? जैसे चिड़ियों की उड़ान में शामिल होते हैं पेड़ मुसीबत के वक्त कौन सी कविताएँ होंगी हमारे साथ लड़ाई के लिए उठ…
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गायत्री | कुशाग्र अद्वैत तुमसे कभी मिला नहीं कभी बातचीत नहीं हुई कहने को कह सकते हैं तुम्हारे बारे में कुछ नहीं जानता ऐसा भी नहीं कि एकदम नहीं जानता ख़बर है कि इस नगर में नई आई हो इधर एक कामचलाऊ कमरा ढूँढ़ने में व्यस्त रही और रोज़गार की दुश्चिंताएँ कुतरती रहीं तुमको रात के इस पहर तुम्हारे नाम कविता लिखने बैठ जाऊँ ऐसी हिमाक़त करने जितना तो शायद नहीं जान…
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हिंदी सी माँ | अजेय जुगरान जब पर्दे खोलने पर ठंड की नर्म धूप पलंग तक आ गई तो बड़ा भाई गेट पर अटका हिंदी अख़बार ले आया माँ के लिए। तेज़ी से वर्तमान भूल रही माँ अब रज़ाई के भीतर ही बैठ तीन तकियों पर टिका पीठ होने लगी तैयार उसे पढ़ने को। सर पर पल्लू माथे पर बिंदी हृदय में भाषा मन में जिज्ञासा हाथ में हिंदी अख़बार और उसे पढ़ने को भूली ऐनक ढूँढती मेरी मा…
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अबकी अगर लौटा तो | कुँवर नारायण अबकी अगर लौटा तो बृहत्तर लौटूंगा चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछे नहीं कमर में बाँधे लोहे की पूँछें नहीं जगह दूँगा साथ चल रहे लोगों को तरेर कर न देखूँगा उन्हें भूखी शेर-आँखों से अबकी अगर लौटा तो मनुष्यतर लौटूंगा घर से निकलते सड़कों पर चलते बसों पर चढ़ते ट्रेनें पकड़ते जगह-बेजगह कुचला पड़ा पिद्दी-सा जानवर नहीं अगर बचा रहा त…
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हारे हुए बुद्धिजीवी का वक्तव्य | सत्यम तिवारी हारे हुए बुद्धि जीवी का वक्तव्य मैं माफ़ी माँगता हूँ जैसे हिम्मत माँगता हूँ मेरे कंधे पर बेलगाम वितृष्णाएँ मेरा चेहरा हारे हुए राजा का रनिवास में जाते हुए मेरी मुद्रा भाड़ में जाते मुल्क की नाव जले सैनिक का मेरा नैराश्य मैं अपना हिस्सा सिर्फ़ इसलिए नहीं छोडूँगा कि संतोष परम सुख है या मृत्यु में ही मुक्त…
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वापसी | केदारनाथ सिंह आज उस पक्षी को फिर देखा जिसे पिछले साल देखा था लगभग इन्हीं दिनों इसी शहर में क्या नाम है उसका खंजन टिटिहिरी, नीलकंठ मुझे कुछ भी याद नहीं मैं कितनी आसानी से भूलता जा रहा हूँ पक्षियों के नाम मुझे सोचकर डर लगा आख़िर क्या नाम है उसका मैं खड़ा-खड़ा सोचता रहा और सिर खुजलाता रहा और यह मेरे शहर में एक छोटे-से पक्षी के लौट आने का विस्फ…
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(अ)विकल्प | किंशुक गुप्ता तुम्हारी महत्वकांक्षाओं से माँ चटक गई है मेरी रीढ़ की हड्डी जिस लहज़े से तुमने पिता सुनाया था फ़रमान कि रेप में लड़की की गलती ज़रूर होगी मैं समझ गया था मेरे धुकधुकाते दिल को किसी भी दिन घोषित कर दोगे टाइम बम मेरे आकाश के सभी नक्षत्र अनाथ होते जा रहे हैं चीटियों की बेतरतीब लकीरों से काली पड़ रही है सफेद पक्षी की देह चोंच के हर…
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नट | राजेश जोशी दीमकें जगह-जगह से खा चुकी हैं तुम्हारे बाँसों को भूख खा चुकी है तुम्हारा सारा बदन क़दमों को साधकर चलते हो जिस रस्सी पर इस छोर से उस छोर टूट चुके हैं उसके रेशे, जर्जर हो चुकी है वो रस्सी जब-जब शुरू करते हो तुम अपना खेल कहीं बहुत क़रीब से आती है यम के भैंसे के खुरों की आवाज़ कहीं बहुत पास सुनाई पड़ती हैं उसके गले में लटकी घंटियाँ। नट!…
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बसंत आया | केदारनाथ अग्रवाल बसंत आया : पलास के बूढ़े वृक्षों ने टेसू की लाल मौर सिर पर धर ली! विकराल वनखंडी लजवंती दुलहिन बन गई, फूलों के आभूषण पहन आकर्षक बन गई। अनंग के धनु-गुण के भौरे गुनगुनाने लगे, समीर की तितिलियों के पंख गुदगुदाने लगे। आम के अंग बौरों की सुगंध से महक उठे, मंगल-गान के सब गायक पखेरू चहक उठे। विकराल : भयंकर, भयानक वनखंडी: वन का ए…
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नई धारा एकल के इस एपिसोड में देखिए जानी मानी अभिनेत्री हिमानी शिवपुरी द्वारा कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘मित्रो मरजानी’ की नाट्य प्रस्तुति में से एक अंश। नई धारा एकल श्रृंखला में अभिनय जगत के सितारे, अपने प्रिय हिन्दी नाटकों में से अंश प्रस्तुत करेंगे और साथ ही साझा करेंगे उन नाटकों से जुड़ी अपनी व्यक्तिगत यादें। दिनकर की कृति ‘रश्मिरथी’ से मोहन राकेश…
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तितलियों की भाषा | मयंक असवाल यदि मुझे तितलियों कि भाषा आती मैं उनसे कहता तुम्हारी पीठ पर जाकर बैठ जाएं बिखेर दें अपने पंखों के रंग जहाँ जहाँ मेरे चुम्बन की स्मृतियाँ शेष बची हैं ताकि वो जगह इस जीवन के अंत तक महफूज रहे। महफूज़ रहे, वो हर एक कविता जिन्होंने अपनी यात्राएँ तुम्हारी पीठ से होकर की जिनकी उत्पत्ति तुमसे हुई और अंत तुम्हारे प्रेम के साथ य…
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लोग कहते है | ममता कालिया लोग कहते हैं मैं अपना ग़ुस्सा कम करूँ समझदार औरतों की तरह सहूँ और चुप रहूँ। ग़ुस्सा कैसे कम किया जाता है? क्या यह चाट के ऊपर पड़ने वाला मसाला है या रेडियो का बटन? जिसे कभी भी कर दो ज़्यादा या कम। यह तो मेरे अन्दर की आग है। एक खौलता कढ़ाह, मेरा दिमाग़ है। मैं एक दहका हुआ कोयला जिस पर जिन्होंने ईंधन डाला है और तेल, फिर हवा भी क…
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घोर अंधकार है | डॉ. श्यौराज सिंह 'बेचैन' घोर अन्धकार है बड़ी उदास रात है न मेल है न प्यार है। जलाओ दीप साथियो कि घोर अन्धकार है। सिसक रहा है चाँद अब तड़प रही है चाँदनी। गली-गली दरिद्रता सुना रही है रागनी। ज़िन्दगी गरीब की अमीर का शिकार है। जलाओ दीप.... कहाँ स्वतन्त्रता, कहाँ समाजवाद की लहर देश तेरी धमनियों में भर दिया गया है ज़हर कली-कली उदास बागवा…
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ये चेतावनी है | विनोद कुमार शुक्ल यह चेतावनी है कि एक छोटा बच्चा है यह चेतावनी है कि चार फूल खिले हैं यह चेतावनी है कि खुशी है और घड़े में भरा हुआ पानी पीने के लायक है, हवा में साँस ली जा सकती है। यह चेतावनी है कि दुनिया है बची दुनिया में मैं बचा हुआ यह चेतावनी है मैं बचा हुआ हूँ किसी होने वाले युद्ध से जीवित बच निकलकर मैं अपनी अहमियत से मरना चाहता…
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कितना लंबा होगा झरना | गुलज़ार कितना लंबा होगा झरना सारा दिन कोहसार पकड़ के नीचे उतरता रहता है फिर भी ख़त्म नहीं होता...! सारा दिन ही बादलों में, ये वादी चलती रहती है न रुकती है, न थमती है बारिश का बर्बत भी बजता रहता है लंबी लंबी हवा की उंगलियाँ थकतीं नहीं जंगल में आवाज़ नदी की बोलते बोलते बैठ गई है भारी लगती है आवाज़ नदी की!! कोहसार - पर्वतीय शृंखला…
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बड़ा बेटा | किंशुक गुप्ता पिता हृदयाघात से ऐसे गए जैसे साबुन की घिसी हुई टिकिया हाथ से छिटक कर गिर जाती है नाली में या पत्थर लगने से अचानक चली जाती है मोबाइल की रोशनी अचानक मैं बड़ा हो गया अनिद्रा के शिकार मेरे पिता को न बक्शी गई गद्दे की नर्माई या कंबल की गरमाई पटक दिया गया कमरे के बाहर जैसे बिल्ली के लिए कसोरे में छोड़ दिया जाता है दूध पूरी रात म…
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शामिल होता हूँ | मलय मैं चाँद की तरह रात के माथे पर चिपका नहीं हूँ, ज़मीन में दबा हुआ गीला हूँ गरम हूँ फटता हूँ अपने अंदर अंकुर की उठती ललक को महसूसता देखने और रचने के सुख में थरथराते पानी में उगते सूर्य की तरह सड़क पर निकला हूँ पूरे आकाश पर नज़र रखे, भाषा की सुबह मेरे रोम-रोम में हरी दूब की तरह हज़ार-हज़ार आँखों से खुली है ज़मीन में दबा हुआ गीला ह…
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इन सर्दियों में | मंगलेश डबराल पिछली सर्दियाँ बहुत कठिन थीं उन्हें याद करने पर मैं इन सर्दियों में भी सिहरता हूँ हालाँकि इस बार दिन उतने कठोर नहीं पिछली सर्दियों में मेरी माँ चली गई थी मुझसे एक प्रेमपत्र खो गया था एक नौकरी छूट गई थी रातों को पता नहीं कहाँ-कहाँ भटकता रहा कहाँ-कहाँ करता रहा टेलीफ़ोन पिछली सर्दियों में मेरी ही चीजें गिरती थीं मुझ पर इ…
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आत्महत्या | शाश्वत उपाध्याय सात आसमानों के पार आठवें आसमान पर जहाँ आकर चाँद रुक जाता है सूरज की रौशनी पर टूटे सपनों के किरचें चमकते हैं दिन और रात की परिभाषायें रद्द हो जाती हैं कि आत्महत्या ऊपर उठती दुनिया की सबसे आखिरी मंज़िल है प्यार के भी बाद किया जाने वाला सबसे तिलिस्मी काम। कोई है जिसके पास काफी कुछ है सुबह है उम्मीद से जगमगाई हुई शाम है चाँदन…
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अपने बजाय | कुँवर नारायण रफ़्तार से जीते दृश्यों की लीलाप्रद दूरी को लाँघते हुए : या एक ही कमरे में उड़ते-टूटते लथपथ दीवारों के बीच अपने को रोक कर सोचता जब तेज़ से तेज़तर के बीच समय में किसी दुनियादार आदमी की दुनिया से हटाकर ध्यान किसी ध्यान देने वाली बात को, तब ज़रूरी लगता है ज़िंदा रखना उस नैतिक अकेलेपन को जिसमें बंद होकर प्रार्थना की जाती है या …
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बन्द कमरे में | प्रभा खेतान बन्द कमरे में मेरी सब चीज़ें अपना परिचय खोने लगती हैं दीवारों के रंग धूमिल नीले पर्दे फीके छत पर घूमता पंखा गतिहीन। तब मैं निकल पड़ती हूँ—बाहर, फुटपाथ पर मूँगफली बेचनेवाला परिचय की मुस्कान देता है और सामने पानवाले की दुकान पर घरवाली का हाल पूछना कहीं अधिक अपना लगता है। चौराहों पर भीड़ के साथ रास्ता पार करना मुझे अकेला नही…
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आत्मस्वीकार | गौरव सिंह जो अपराध मैंने किये, वो जीवन जीने की न्यूनतम ज़रूरत की तरह लगे! मैंने चोर निगाहों से स्त्रियों के वक्ष देखे और कई बार एक लड़की का हृदय ना समझ सकने की शर्म के साथ सोया मुझे परिजनों की मौत पर रुलाई नहीं फूटी और कई दफ़े चिड़ियों की चोट पर फफककर रोया मैं अपने लोगों के बीच एक लम्बी ऊब के साथ रहा और चाय बेचती एक औरत का सारा दुःख जान ल…
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चट्टान को तोड़ो वह सुंदर हो जाएगी | केदारनाथ सिंह चट्टान को तोड़ो वह सुंदर हो जाएगी उसे और तोड़ो वह और, और सुंदर होती जाएगी अब उसे उठाओ रख लो कंधे पर ले जाओ किसी शहर या क़स्बे में डाल दो किसी चौराहे पर तेज़ धूप में तपने दो उसे जब बच्चे आएँगे उसमें अपने चेहरे तलाश करेंगे अब उसे फिर से उठाओ अबकी ले जाओ किसी नदी या समुद्र के किनारे छोड़ दो पानी में उस…
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अचानक नहीं गई माँ | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी अचानक नहीं गई माँ जैसे चला जाता है टोंटी का पानी या तानाशाह का सिंहासन थोड़ा-थोड़ा रोज गई वह जैसे जाती है कलम से स्याही जैसे घिसता है शब्द से अर्थ सुकवा और षटमचिया से नापे थे उसने समय के सत्तर वर्ष जीवन को कुतरती धीरे-धीरे गिलहरी-सी चढ़ती-उतरती काल वृक्ष पर गीली-सूखी लकड़ी-सी चूल्हे की धुआँ देती सुलगती जलत…
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सच छूछा होता है।- अमिताव कुमार महात्मा गाँधी की आत्मकथा में मौसम का कहीं ज़िक्र नहीं, लंदन की किसी ईमारत या सड़क के बारे में कोई बयान नहीं, किसी कमरे की, कभी एकत्रित भीड़ या यातायात के किसी साधन की कहीं कोई चर्चा नहीं– यह वी. एस. नायपॉल की आलोचना है। लेकिन मौसम तो गांधीजी के अंदर था! तूफान से जूझती एक अडिग आत्मा– नैतिकता की पतली पगडण्डी पर ठोकर खात…
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गाँव गया था, गाँव से भागा | कैलाश गौतम गाँव गया था गाँव से भागा। रामराज का हाल देखकर पंचायत की चाल देखकर आँगन में दीवाल देखकर सिर पर आती डाल देखकर नदी का पानी लाल देखकर और आँख में बाल देखकर गाँव गया था गाँव से भागा। गाँव गया था गाँव से भागा। सरकारी स्कीम देखकर बालू में से क्रीम देखकर देह बनाती टीम देखकर हवा में उड़ता भीम देखकर सौ-सौ नीम हकीम देखकर …
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कवि की आत्महत्या | देवांश एकांत अभिनेता अभिनय करते-करते मृत्यु का मंचन करने लगता है आप उन्मत्त होते हैं अभिनय देख पीटना चाहते हैं तालियाँ मगर इस बार वह नही उठता क्योंकि जीवन के रंगमंच में एक ही ‘कट-इट’ होता है कोई हँसते-हँसाते शहर के पुल से छलाँग लगा देता है और तब पिता के साथ नवका विहार में आया लड़का जान पाता है पानी की सतह पर मछलियाँ ही नहीं आदमी …
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ख़ुदाओं से कह दो | किश्वर नाहीद जिस दिन मुझे मौत आए उस दिन बारिश की वो झड़ी लगे जिसे थमना न आता हो, लोग बारिश और आँसुओं में तमीज़ न कर सकें जिस दिन मुझे मौत आए इतने फूल ज़मीन पर खिलें कि किसी और चीज़ पर नज़र न ठहर सके, चराग़ों की लवें दिए छोड़कर मेरे साथ-साथ चलें बातें करती हुई मुस्कुराती हुई जिस दिन मुझे मौत आए उस दिन सारे घोंसलों में सारे परिंदों…
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पुष्प की अभिलाषा - माखनलाल चतुर्वेदी चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ। चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ॥ चाह नहीं, सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊँ। चाह नहीं, देवों के सिर पर चढूँ, भाग्य पर इठलाऊँ॥ मुझे तोड़ लेना वनमाली। उस पथ में देना तुम फेंक॥ मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने। जिस पथ जावें वीर अनेक॥…
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तेरा नाम नहीं | निदा फ़ाज़ली तेरे पैरों चला नहीं जो धूप छाँव में ढला नहीं जो वह तेरा सच कैसे, जिस पर तेरा नाम नहीं? तुझसे पहले बीत गया जो वह इतिहास है तेरा तुझको ही पूरा करना है जो बनवास है तेरा तेरी साँसें जिया नहीं जो घर आँगन का दिया नहीं जो वो तुलसी की रामायण है तेरा राम नहीं तेरा ही तन पूजा घर है कोई मूरत गढ़ ले कोई पुस्तक साथ न देगी चाहे जितना…
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नई धारा एकल के पहले एपिसोड में देखिए मशहूर अभिनेता राजेन्द्र गुप्ता द्वारा मोहन राकेश के नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ के अंश का पाठ। नई धारा एकल श्रृंखला में अभिनय जगत के सितारे, अपने प्रिय हिन्दी नाटकों में से अंश प्रस्तुत करेंगे और साथ ही साझा करेंगे उन नाटकों से जुड़ी अपनी व्यक्तिगत यादें। दिनकर की कृति ‘रश्मिरथी’ से मोहन राकेश के नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’…
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गवैया | शहंशाह आलम गवैया अपनी पीड़ा को पूरी लय के साथ गाता है आज वह न दुःख को बाँधता है न उदासी को न धूप को न बादल को न अपनी आत्मा को गवैया सेतु को गाता है उसके नीचे बहते जल को गाता है रंग को गाता है शहद को गाता है नमक को गाता है महुआ को गाता है जामुन को गाता है नीम को गाता है गवैया अपनी धुन की गति और उतार-चढ़ाव में गायन की शैली में बस अपने समय को …
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शर्तों पर टिका है मेरा प्रेम | अनुपम सिंह मुझसे प्रेम करने के लिए तुम्हें शुरू से शुरू करना होगा पैदा होना होगा स्त्री की कोख से उसकी और तुम्हारी धड़कन धड़कनी होगी एक साथ मुझसे प्रेम करने के लिए सँभलकर चलना होगा हरी घास पर उड़ते हुए टिड्डे को पहले उड़ने देना होगा पेड़ों के पत्ते बहुत ज़रूरत पर ही तोड़ने होंगे कि जैसे आदिवासी लड़के तोड़ते हैं फूलों …
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वो कहाँ हैं जो कविता लिखती हैं | रूपम मिश्र वे बहुत दिन बाद आए हैं भइया के सखा हैं तो रवायतन मेरे भइया हैं किसी पत्रिका में मेरी कविता पढ़ अभिभूत हैं भइया से अक्सर मेरा बखान करते एक बार मिलना चाहते भइया भी अप्रत्याशित गर्व से भर जाते और लखनऊ आने पर मुझसे मिलवाने का वादा करते फिर जल्दी संजोग बना भतीजे के हैप्पी बर्थ डे में वे पधारे भइया ने भीड़ में …
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पुरुषार्थ | श्रद्धा उपाध्याय क्या पुरुषार्थ के अधिकार क्षेत्र में शामिल हैं औरतें जो रचाती हैं रास औरतें जो पकड़ी रहती हैं आस औरतें जो अग्नि में तप्ती हैं औरतें जो मूड नेह में घटती हैं औरतें जो उठाती हैं भांडे औरतें जो चलाती हैं चरखे औरतें जो घर चलाती हैं औरतें जो जूठन खाती हैं औरतें जो लहू में नहाती हैं और जो धान लगती हैं औरतें जो तीज मनाती हैं मै…
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मिठाई बनाने वाले | शाश्वत उपाध्याय जब दुनिया बनी तो सबसे पहले बने मिठाई बनाने वाले हाथों में भर भर के चीनी की परत परत भी ऐसी वैसी नहीं एकदम गूलर का फूल छुआ के जितना खर्च हो, उतना बढ़े उंगली के पोरों में घी का कनस्तर, कनस्तर भी वही गूलर के फूलों वाला आँखों में परख, परख भी एकदम पाग चिन्ह लेने वाली इतने सब के बाद बोली तो मीठी होनी ही थी सो भी है। लेकिन…
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उक्ति | सूर्यकांत त्रिपाठी निराला कुछ न हुआ, न हो। मुझे विश्व का सुख, श्री, यदि केवल पास तुम रहो ! मेरे नभ के बादल यदि न कटे— चंद्र रह गया ढका, तिमिर रात को तिरकर यदि न अटे लेश गगन-भास का, रहेंगे अधर हँसते, पथ पर, तुम हाथ यदि गहो। बहु-रस साहित्य विपुल यदि न पढ़ा— मंद सबों ने कहा— मेरा काव्यानुमान यदि न बढ़ा— ज्ञान जहाँ का रहा, रहे, समझ है मुझमें पू…
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अंगोर | जसिंता केरकेट्टा शहर का अंगार जलता है, जलाता है फिर राख हो जाता है। गाँव के अंगोर एक चूल्हे से जाते हैं दूसरे चूल्हे तक और सभी चूल्हे सुलग उठते हैं।द्वारा Nayi Dhara Radio
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हवा में पुल | मदन कश्यप हवा में पुल था इसीलिए हवा का पुल था क्योंकि हवा का पुल ही हवा में हो सकता था (आप चाहें तो इस पाठ को बदल सकते हैं, वह इस प्रकार: हवा का पुल था इसीलिए हवा में पुल था क्योंकि हवा का पुल हवा में ही हो सकता था).... वैसे पुल के होने के लिए कहीं न कहीं धरती से उसका जुड़ा हुआ होना ज़रूरी होता है। पुल क्या कोई भी ढाँचा केवल हवा में नह…
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कविता | दामोदर खड़से समय जब कहीं गिरवी हो जाता है साँसें तब कितनी भारी हो जाती हैं आसपास दिखता नहीं कुछ भी केवल देह दौड़ती है बरसाती बादलों की तरह हाँफना भी भुला देती है थकान! ऐसे में तब तुम कविता की ताबीज बाँहों पर बाँध लेना! एक गुनगुनाहट छोटे-छोटे छंदों की फुसफुसाहट शब्दों की दस्तक और अपनी आहट भीतर ही भीतर पा लेना! कविता, अँधेरी रातों को चुभती विस…
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लौट के वापस आना | श्रेय कारखुर मेरी भाषा के एक बुजुर्ग कवि ने कहा है कि घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौट के वापस आने के लिए होता है मैंने हमेशा इन पंक्तियों को भरा हुआ पाया है बहुत सी उम्मीद और ढेर सारे इंतज़ार से लौट के वापस आने में इंतज़ार भर की दूरी होती है जिसे तय करती है पहाड़ों से लौटती गूंज इस उम्मीद में, कि कोई उसके लौटने का इंत…
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अपराध | लीलाधर जगूड़ी जहाँ-जहाँ पर्वतों के माथे थोड़ा चौड़े हो गए हैं वहीं-वहीं बैठेंगे फूल उगने तक एक-दूसरे की हथेलियाँ गर्माएँगे दिग्विजय की ख़ुशी में मन फटने तक देह का कहाँ तक करें बँटवारा आजकल की घास पर घोड़े सो गए हैं मृत्यु को जन्म देकर ईश्वर अपराधी है इतनी ज़ोरों से जिएँ हम दोनों कि ईश्वर के अँधेरे को क्षमा कर सकें।…
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संगतकार | मंगलेश डबराल मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देती वह आवाज़ सुंदर कमज़ोर काँपती हुई थी वह मुख्य गायक का छोटा भाई है या उसका शिष्य या पैदल चलकर सीखने आने वाला दूर का कोई रिश्तेदार मुख्य गायक की गरज में वह अपनी गूँज मिलाता आया है प्राचीन काल से गायक जब अंतरे की जटिल तानों के जंगल में खो चुका होता है या अपने ही सरगम को लाँघकर चला ज…
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नए तरह से लैस होकर आ गई है नई सदी | शाश्वत उपाध्याय जो दिख नहीं रही मनिहारिन, उसके चूड़ियों का बाज़ार बेड़ियों के भेंट चढ़ गया है। मोतियों की दुकान से सीपियों ने रार ठान लिया है नई तरह की लड़ाई लेकर आई है नई सदी। टिकुली साटती-दोपहर काटती सारी औरतें शिव चर्चाओं में गूंथ दी गईं हैं। शिव के गीतों में, अब छपरा-सिवान के सज्जन का ज़िक्र भी होने लगा है नई तरह क…
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प्रमाणपत्र - अर्चना वर्मा लक्षणों की किताब से उसने चुन लिया एक रोग और उसे जीवन का भोग बना लिया उसके पास भी था आखिरकार दिखाने के लिए एक घाव वह उसे चाव से सहलाते हुए पालने लगा शामों का अकेलापन अब काटने नहीं दौड़ता बातचीत के लिए विषयों की कमी नहीं चिकित्सा की नवीनतम शोध से मृत्यु दर के आँकड़े तक बिकाऊ हैं उसकी दुकान में वे अब आते हैं अक्सर हाथों में फ…
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माँ का चेहरा | कृष्ण कल्पित जब छीन ली जाएगी हमसे एक-एक स्मृति जब किसी के पास कुछ नहीं बचेगा पीतल के तमग़ों के सिवा जब सब कुछ ठहर जाएगा एक-एक पत्ता झर जाएगा सब पत्थर हो जाएगा ठोस और खुरदुरा नदी में नहीं दिखाई देगी चाँद की परछाईं किसी आँख में नहीं बचेगा सपना हम सब कुछ भूल जाएँगे घर का रास्ता, गाँव का नाम दस का पहाड़ा, सब कुछ तब कौन जान पाएगा छब्बीस अग…
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रेखते में कविता | उदय प्रकाश जैसे कोई हुनरमन्द आज भी घोड़े की नाल बनाता दीख जाता है ऊँट की खाल की मसक में जैसे कोई भिश्ती आज भी पिलाता है जामा मस्जिद और चाँदनी चौक में प्यासों को ठण्डा पानी जैसे अमरकंटक में अब भी बेचता है कोई साधू मोतियाबिन्द के लिए गुलबकावली का अर्क शर्तिया मर्दानगी बेचता है हिन्दी अख़बारों और सस्ती पत्रिकाओं में अपनी मूँछ और पग्ग…
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वस्तुतः | भवानी प्रसाद मिश्र मैं जो हूँ मुझे वही रहना चाहिए। यानी वन का वृक्ष खेत की मेंड़ नदी की लहर दूर का गीत व्यतीत वर्तमान में उपस्थित भविष्य में मैं जो हूँ मुझे वही रहना चाहिए तेज़ गर्मी मूसलाधार वर्षा कड़ाके की सर्दी ख़ून की लाली दूब का हरापन फूल की जर्दी मैं जो हूँ मुझे वही रहना चाहिए मुझे अपना होना ठीक-ठीक सहना चाहिए तपना चाहिए अगर लोहा हूँ …
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