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परमेश्वर की सेवा करने का लाभ

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“वे उसके दास होंगे जिससे कि वे जान लें कि मेरी सेवा तथा देश देश के राज्यों की सेवा में क्या अन्तर है।” (2 इतिहास 12:8)

परमेश्वर की सेवा करना किसी भी अन्य जन की सेवा करने से पूर्णतः भिन्न है।

परमेश्वर इसके लिए अत्यन्त जलन रखता है कि हम इस बात को समझें – और इसका आनन्द उठाएँ। उदाहरण के लिए वह हमें आज्ञा देता है कि “आनन्द से यहोवा की आराधना (सेवा) करो!” (भजन 100:2)। इस आनन्द के पीछ एक कारण है। और यह कारण प्रेरितों के काम 17:25 में दिया गया है। “न ही मनुष्यों के हाथों से [परमेश्वर की] सेवा-टहल होती है, मानो कि उसे किसी बात की आवश्यकता हो, क्योंकि वह स्वयं सब को जीवन, श्वास और सब कुछ प्रदान करता है।”

हम आनन्द से उसकी सेवा करते हैं क्योंकि हम उसकी आवश्यकताओं को पूरा करने का बोझ नहीं उठाते हैं। उसे तो किसी बात की आवश्यकता ही नहीं है। अतः उसकी सेवा करने का अर्थ यह नहीं हो सकता है कि हम उसकी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। इसके विपरीत हम तो ऐसी सेवा में आनन्दित होते हैं जहाँ वो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करता है। परमेश्वर की सेवा करने का सदैव यही अर्थ होता है कि उस कार्य को करने के लिए अनुग्रह प्राप्त करना जो कार्य हमें करना है।

यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर कितना जलन रखता है कि हम इस बात को समझें और वह इसमें महिमान्वित हो, 2 इतिहास 12 में एक कहानी दी गई है। सुलैमान के पुत्र रहूबियाम ने इस्राएल के दस गोत्रों के विद्रोह करने के बाद दक्षिणी राज्य पर शासन किया था, उसने यहोवा की सेवा करने के विरुद्ध निर्णय लिया और अन्य देवताओं तथा दूसरे राज्यों को अपनी सेवा दी।

न्याय के रूप में, परमेश्वर ने 1200 रथों और 60,000 घुड़सवारों के साथ मिस्र के राजा शीशक को रहूबियाम के विरुद्ध भेजा (2 इतिहास 12:2-3)।

करुणा में होकर परमेश्वर ने रहूबियाम के पास शमायाह नबी को इस सन्देश के साथ भेजा: “यहोवा यों कहता है, ‘तुमने मुझे त्याग दिया है, अतः मैंने तुमको त्यागकर शीशक के हाथ में कर दिया है’” (2 इतिहास 12:5)। उस सन्देश का सुखद परिणाम यह हुआ कि रहूबियाम और उसके शासकों ने स्वयं को दीन किया और कहा, “यहोवा धर्मी है” (2 इतिहास 12:6)।

जब यहोवा ने देखा कि उन्होंने स्वयं को दीन किया है तो उसने कहा “उन्होंने अपने आप को दीन किया, अतः मैं उनको नष्ट नहीं करूँगा वरन् मैं उनको कुछ सीमा तक छुटकारा दूँगा, और मेरा प्रकोप शीशक द्वारा यरूशलेम पर न भड़केगा” (2 इतिहास 12:7)। परन्तु उनको अनुशासित करने के लिए वह कहता है, “वे उसके दास तो होंगे जिससे कि वे जान लें कि मेरी सेवा तथा देश देश के राज्यों की सेवा में क्या अन्तर है” (2 इतिहास 12:8)।

बात स्पष्ट है: शत्रु की सेवा करना और परमेश्वर की सेवा करना, दोनों में बहुत अन्तर है। कैसे? परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ है प्राप्त करना और आशीषित होना और आनन्दित होना और लाभान्वित होना। शीशक की सेवा करने का अर्थ है थककर चूर होना, क्षय हो जाना तथा दुःख से भर जाना। परमेश्वर देने वाला है। परन्तु शीशक लेने वाला है।

इसीलिए मैं यह कहने के लिए अति उत्साही हूँ कि रविवारीय आराधना तथा प्रतिदिन की जाने वाली आज्ञाकारिता की आराधना, बोझिल होकर परमेश्वर को देना नहीं, किन्तु परमेश्वर से आनन्दपूर्वक प्राप्त करना है। यही वह सच्ची सेवा है जिसकी परमेश्वर माँग करता है। जो कुछ भी आप करते हैं, उसमें भरोसा रखें कि देने वाला तो परमेश्वर ही है।

--- Send in a voice message: https://podcasters.spotify.com/pod/show/marg-satya-jeevan/message

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“वे उसके दास होंगे जिससे कि वे जान लें कि मेरी सेवा तथा देश देश के राज्यों की सेवा में क्या अन्तर है।” (2 इतिहास 12:8)

परमेश्वर की सेवा करना किसी भी अन्य जन की सेवा करने से पूर्णतः भिन्न है।

परमेश्वर इसके लिए अत्यन्त जलन रखता है कि हम इस बात को समझें – और इसका आनन्द उठाएँ। उदाहरण के लिए वह हमें आज्ञा देता है कि “आनन्द से यहोवा की आराधना (सेवा) करो!” (भजन 100:2)। इस आनन्द के पीछ एक कारण है। और यह कारण प्रेरितों के काम 17:25 में दिया गया है। “न ही मनुष्यों के हाथों से [परमेश्वर की] सेवा-टहल होती है, मानो कि उसे किसी बात की आवश्यकता हो, क्योंकि वह स्वयं सब को जीवन, श्वास और सब कुछ प्रदान करता है।”

हम आनन्द से उसकी सेवा करते हैं क्योंकि हम उसकी आवश्यकताओं को पूरा करने का बोझ नहीं उठाते हैं। उसे तो किसी बात की आवश्यकता ही नहीं है। अतः उसकी सेवा करने का अर्थ यह नहीं हो सकता है कि हम उसकी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। इसके विपरीत हम तो ऐसी सेवा में आनन्दित होते हैं जहाँ वो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करता है। परमेश्वर की सेवा करने का सदैव यही अर्थ होता है कि उस कार्य को करने के लिए अनुग्रह प्राप्त करना जो कार्य हमें करना है।

यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर कितना जलन रखता है कि हम इस बात को समझें और वह इसमें महिमान्वित हो, 2 इतिहास 12 में एक कहानी दी गई है। सुलैमान के पुत्र रहूबियाम ने इस्राएल के दस गोत्रों के विद्रोह करने के बाद दक्षिणी राज्य पर शासन किया था, उसने यहोवा की सेवा करने के विरुद्ध निर्णय लिया और अन्य देवताओं तथा दूसरे राज्यों को अपनी सेवा दी।

न्याय के रूप में, परमेश्वर ने 1200 रथों और 60,000 घुड़सवारों के साथ मिस्र के राजा शीशक को रहूबियाम के विरुद्ध भेजा (2 इतिहास 12:2-3)।

करुणा में होकर परमेश्वर ने रहूबियाम के पास शमायाह नबी को इस सन्देश के साथ भेजा: “यहोवा यों कहता है, ‘तुमने मुझे त्याग दिया है, अतः मैंने तुमको त्यागकर शीशक के हाथ में कर दिया है’” (2 इतिहास 12:5)। उस सन्देश का सुखद परिणाम यह हुआ कि रहूबियाम और उसके शासकों ने स्वयं को दीन किया और कहा, “यहोवा धर्मी है” (2 इतिहास 12:6)।

जब यहोवा ने देखा कि उन्होंने स्वयं को दीन किया है तो उसने कहा “उन्होंने अपने आप को दीन किया, अतः मैं उनको नष्ट नहीं करूँगा वरन् मैं उनको कुछ सीमा तक छुटकारा दूँगा, और मेरा प्रकोप शीशक द्वारा यरूशलेम पर न भड़केगा” (2 इतिहास 12:7)। परन्तु उनको अनुशासित करने के लिए वह कहता है, “वे उसके दास तो होंगे जिससे कि वे जान लें कि मेरी सेवा तथा देश देश के राज्यों की सेवा में क्या अन्तर है” (2 इतिहास 12:8)।

बात स्पष्ट है: शत्रु की सेवा करना और परमेश्वर की सेवा करना, दोनों में बहुत अन्तर है। कैसे? परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ है प्राप्त करना और आशीषित होना और आनन्दित होना और लाभान्वित होना। शीशक की सेवा करने का अर्थ है थककर चूर होना, क्षय हो जाना तथा दुःख से भर जाना। परमेश्वर देने वाला है। परन्तु शीशक लेने वाला है।

इसीलिए मैं यह कहने के लिए अति उत्साही हूँ कि रविवारीय आराधना तथा प्रतिदिन की जाने वाली आज्ञाकारिता की आराधना, बोझिल होकर परमेश्वर को देना नहीं, किन्तु परमेश्वर से आनन्दपूर्वक प्राप्त करना है। यही वह सच्ची सेवा है जिसकी परमेश्वर माँग करता है। जो कुछ भी आप करते हैं, उसमें भरोसा रखें कि देने वाला तो परमेश्वर ही है।

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