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ग़ज़ल - न सुकून है (Ghazal - Na Sukun Hai)

6:43
 
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न सुकून है न ही चैन है; न ही नींद है न आराम है।

मेरी सुब्ह भी है थकी हुई; मेरी कसमसाती सी शाम है।

न ही मंज़िलें हैं निगाह में; न मक़ाम पड़ते हैं राह में,

ये कदम तो मेरे ही बढ़ रहे; कहीं और मेरी लगाम है।

कि बड़ी बुरी है वो नौकरी; जो ख़ुदी को ख़ुद से ही छीन ले,

यहाँ पिस रहा है वो आदमी; जो बना किसी का ग़ुलाम है।

---

---

शाइर - विवेक अग्रवाल 'अवि'

आवाज़ - नरेश नरूला

--- Send in a voice message: https://podcasters.spotify.com/pod/show/vivek-agarwal70/message

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मेरी सुब्ह भी है थकी हुई; मेरी कसमसाती सी शाम है।

न ही मंज़िलें हैं निगाह में; न मक़ाम पड़ते हैं राह में,

ये कदम तो मेरे ही बढ़ रहे; कहीं और मेरी लगाम है।

कि बड़ी बुरी है वो नौकरी; जो ख़ुदी को ख़ुद से ही छीन ले,

यहाँ पिस रहा है वो आदमी; जो बना किसी का ग़ुलाम है।

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