वैराग्य आनंद का द्वार है (अध्यात्म उपनिषद - बारहवां प्रवचन )

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वासनाऽनुदयो भोग्ये वैराग्यस्य तदाऽवधिः।

अहंभावावोदयाभावो बोधस्य परमावधिः।। 41।।

लीनवृत्तेरनुत्पत्तिर्मर्यादोपरतेस्तु सा।

स्थितप्रज्ञो यतिरयं यः सदानन्दमश्नुते।। 42।।

ब्रह्मण्येव विलीनात्मा निर्विकारो विनिष्क्रियः।

ब्रह्मात्मनो शोधितयोरेकभावावगाहिनी।। 43।।

निर्विकल्पा च चिन्मात्रा वृत्तिःप्रज्ञेति कथ्यते।

सा सर्वदा भवेद्यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते।। 44।।

देहेन्द्रियेष्वहंभाव इदंभावस्तदन्यके।

यस्य नो भवतः क्वापि स जीवन्मुक्त इष्यते।। 45।।

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