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show episodes
 
"हमेशा याद रखें, जो भी मैं आपसे कहता हूं, आप इसे दो तरीकों से ले सकते हैं। आप इसे बस मेरे अधिकार पर ले जा सकते हैं, 'क्योंकि ओशो ऐसा कहते हैं, यह सच होना चाहिए' - तब आप पीड़ित होंगे, तब आप नहीं बढ़ेंगे। "मैं जो भी कहता हूं, उसे सुनो, इसे समझने की कोशिश करो, इसे अपने जीवन में लागू करो, देखो कि यह कैसे काम करता है, और फिर अपने निष्कर्ष पर आओ। वे वही हो सकते हैं, वे नहीं भी हो सकते हैं। वे कभी भी समान नहीं हो सकते क्योंकि आपके पास एक अलग व्यक्तित्व है, एक अद्वितीय व्यक्ति है। ” Visit: https://l ...
 
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show series
 
जनक उवाच। अहो जनसमूहेऽपि न द्वैतं पश्यतो मम। अरण्यमिव संवृत्तं क्व रतिं करवाण्यहम्‌।। 41।। नाहं देहो न मे देहो जीवो नाहमहं हि चित्‌। अयमेव हि मे बंध आसीधा जीविते स्पृहा।। 42।। अहो भुवन कल्लोलैर्विचित्रैद्रकि समुत्थितम्‌। मयनंतमहाम्भोधौ चित्तवाते समुद्यते।। 43।। मयनंतमहाम्भोधौ चित्तवाते प्रशाम्यति। अभाग्याजीववणिजो जगतपोतो विनश्वरः।। 44।। मयनंतमहाम्भ…
 
प्रभु प्रसाद परिपूर्ण प्रयत्न से (अष्‍टावक्र : महागीता - 12)
 
जनक उवाच। ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवम्‌। अज्ञानाद्भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरंजनः।। 35।। द्वैतमूलमहो दुःखं नान्यत्तस्यास्ति भेषजम्‌। दृश्यमेतन्मृषा सर्वमेकोऽहं चिद्रसोऽमलः।। 36।। बोधमात्रोऽहमज्ञानादुपाधिः कल्पितो मया। एवं विमृश्यतो नित्य निर्विकल्पे स्थितिर्मम।। 37।। न मे बंधोऽस्ति मोक्षो वा भ्रांतिः शांता निराश्रया। अहो मयि स्थि…
 
जनक उवाच। प्रकाशो में निजं रूपं नातिरिक्तोऽस्म्यहं ततः। यदा प्रकाशते विश्वं तदाऽऽहंभास एव हि।। 28।। अहो विकल्पितं विश्वमज्ञानान्मयि भासते। रूप्यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सूर्यकरे यथा।। 29।। मत्तो विनिर्गतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति। मृदि कुम्भो जले वीचिः कनके कटकं यथा।। 30।। अहो अहं नमो मह्यं विनाशो यस्य नास्ति में। ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगन्नाशेऽपि …
 
जनक उवाच। अहो निरंजनः शांतो बोधोऽहं प्रकृतेः परः। एतावंतमहं कालं मोहेनैव विडंबितः।। 21।। यथा प्रकाशाम्येको देहमेनं तथा जगत्‌। अतो मम जगत्सर्वमथवा न च किंचन।। 22।। सशरीरमहो विश्वं परित्यज्य मयाऽऽधुना! कुतश्चित्‌ कौशलादेव परमात्मा विलोक्यते।। 23।। यथा न तोयतो भिन्नस्तरंगाः फेनबुद्बुदाः। आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम्‌।। 24।। तंतुमात्रो भवेद…
 
अष्टावक्र उवाच। देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोऽसि पुत्रक। बोधोऽहं ज्ञानखंगेन तन्निष्कृत्य सुखी भव।। 14।। निःसंगो निष्क्रियोऽसि त्वं स्वप्रकाशो निरंजनः। अयमेव हि ते बंधः समाधिमनुतिष्ठसि।। 15।। त्वया व्याप्तमिदं विश्वं त्वयि प्रोतं यथार्थतः। शुद्धबुद्ध स्वरूपस्त्वं मागमः क्षुद्रचित्तताम्‌।। 16।। निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः। अगाध बुद्धिरक्षुब्धो …
 
कर्म, विचार, भाव--और साक्षी (अष्‍टावक्र : महागीता - 04)
 
अष्टावक्र उवाच। एको द्रष्टाऽसि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा। अयमेव हि ते बंधो द्रष्टारं पश्यसीतरम्‌।। 7।। अहं कतेत्यहंमानमहाकृष्णहि दंशितः। नाहं कर्त्तेति विश्वासामृतं पीत्वा सुखी भव।। 8।। एको विशुद्धबोधोऽहमिति निश्चवह्निना। प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव।। 9।। यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत्‌। आनंदपरमानंदः स बोधस्त्वं सुखं चर।। 10।…
 
जनक उवाच। कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति। वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद् ब्रूहि मम प्रभो।। 1।। अष्टावक्र उवाच। मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान्‌ विषवत्त्यज। क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद् भज।। 2।। न पृथ्वी न जलं नाग्निर्न वायुद्यौर्न वा भवान्‌। एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्दि मुक्तये।। 3।। यदि देहं पृथक्कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि। अधुनैव स…
 
रंगि-रंगि चंदन चढ़ावहु, सांईं के लिलार रे।। मन तें पुहुप माल गूंथिकै, सो लैकै पहिरावहु रे। बिना नैन तें निरखु देखु छवि, बिन कर सीस नवावहु रे।। दुइ कर जोरिकै बिनती करिकै, नाम कै मंगल गावहु रे। जगजीवन विनती करि मांगै, कबहुं नहीं बिसरावहु रे।। यहि नगरी में होरी खेलौं री।। हमरी पिया तें भेंट करावौ, तुम्हरे संग मिलि दौरौं री।। नाचौं नाच खोलि परदा मैं, अन…
 
गुरु है शमा, शिष्य परवाना (अरी, मैं तो नाम के रंग छकी - 08)
 
गऊ निकसि बन जाहीं। बाछा उनका घर ही माहीं।। तृन चरहिं चित्त सुत पासा। गहि जुक्ति साध जग-बासा।। साध तें बड़ा न कोई। कहि राम सुनावत सोई।। राम कही, हम साधा। रस एकमता औराधा।। हम साध, साध हम माहीं। कोउ दूसर जानै नाहीं।। जन दूसर करि जाना। तेहिं होइहिं नरक निदाना।। जगजीवन चरन चित लावै। सो कहिके राम समुझावै।। साध कै गति को गावै। जो अंतर ध्यान लगावै।। चरन रहे…
 
अंतर्यात्रा है परमात्मा (अरी, मैं तो नाम के रंग छकी - 06)
 
अरी, मैं तो नाम के रंग छकी।। जब तें चाख्या बिमल प्रेमरस, तब तें कछु न सोहाई। रैनि दिना धुनि लागि रहीं, कोउ केतौ कहै समुझाई।। नाम पियाला घोंटिकै, कछु और न मोहिं चही। जब डोरी लागी नाम की तब केहिकै कानि रही।। जो यहि रंग में मस्त रहत है, तेहि कैं सुधि हरना। गगन-मंदिल दृढ़ डोरि लगावहु, जाहि रहौ सरना। निर्भय ह्वैकै बैठि रहौं अब, मांगौं यह बर सोई।। जगजीवन …
 
महासुख - फैलना और फैलते जाना (अरी, मैं तो नाम के रंग छकी - 04)
 
जोगिन भइउं अंग भसम चढ़ाय। कब मोरा जियरा जुड़इहौ आय।। अस मन ललकै, मिलौं मैं धाय। घर-आंगन मोहिं कछु न सुहाय।। अस मैं ब्याकुल भइउं अधिकाय।। जैसे नीर बिन मीन सुखाय।। आपन केहि तें कहौं सुनाय। जो समुझौं तौ समुझि न आय।। संभरि-संभरि दुख आवै रोय। कस पापी कहं दरसन होय।। तन मन सुखित भयो मोर आय। जब इन नैनन दरसन पाय।। जगजीवन चरनन लपटाय। रहै संग अब छूटि न जाय।। अब…
 
सत्संग सरोवर, भक्ति स्नान (अरी, मैं तो नाम के रंग छकी - 02)
 
साईं, जब तुम मोहि बिसरावत। भूलि जात भौजाल-जगत मां, मोहिं नाहिं कछु भावत।। जानि परत पहिचान होत जब, चरन-सरन लै आवत। जब पहिचान होत है तुमसे, सूरति सुरति मिलावत।। जो कोई चहै कि करौं बंदगी, बपुरा कौन कहावत। चाहत खैंचि सरन ही राखत, चाहत दूरि बहावत।। हौं अजान अज्ञान अहौं प्रभु, तुमतें कहिकै सुनावत। जगजीवन पर करत हौ दाया, तेहिते नहिं बिसरावत।। बहुतक देखादे…
 
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