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बालमोदिनी

सम्भाषणसन्देशः

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रोज
 
सम्भाषणसन्देशः इति संस्कृतमासिकपत्रिका (https://sambhashanasandesha.in) । एतस्यां पत्रिकायां प्रकाशिताः लेखाः, कथाः, बालकथाः, वार्ताः इत्यादिकं सर्वम् अपि सरलसंस्कृतेन एव प्रकाश्यते । तत्रत्याः “बालमोदिनी”नामिकाः बालकथाः अत्र प्रसार्यन्ते । अतः अस्याः शृङ्खलायाः नाम अपि “बालमोदिनी” एव । लघु गात्रं, सरला भाषा च कथानां विशेषः । प्रत्येकं कथा काञ्चित् नीतिं बोधयति । बालकथाः आबालवृद्धं सर्वेषां प्रियाः । संस्कृतेन ताः श्रोतुम् उपलब्धाः भवन्तु इति एषः प्रयत्नः श्रोतृभ्यः अवश्यं रोचेत इति विश्वासः ...
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DHADKANE MERI SUN

Dr. Rajnish Kaushik

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मासिक
 
Self composed various aspects of love, various feelings, sensations and colors of love with enchanting and melodious words of Hindi and Urdu language have been presented in a very poetic manner in every episode of this podcast . All the episodes of this podcast are solemnly dedicated to all the lovers just as the cycle of love never ends in the same way these love lyrics episode will move on, move on and move on...
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इतालवी शिक्षण त्वरक

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साप्ताहिक
 
यदि आप इतालवी सीखने के बारे में सोचने का प्रयास कर रहे हैं, तो आप गलत कर रहे हैं। जैसे आपने हिंदी सीखी वैसे ही इटालियन सीखें: बड़ी मात्रा में सुनकर। (कम से कम एक अस्पष्ट विचार के साथ कि इसका क्या मतलब है!) हजारों इतालवी वाक्यांश, हिंदी अनुवादों के साथ, सीधे आपके मस्तिष्क में प्रस्तुत किए जाते हैं: व्यावहारिक से दार्शनिक तक और छेड़खानी तक। केवल वाक्यांश, कोई पूरक नहीं! न केवल संवाद करने के लिए, बल्कि वास्तव में इतालवी भाषा में एक दिलचस्प व्यक्ति बनने के लिए इतालवी भाषा की बुनियादी बातों से भी ...
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स्पैनिश सीखने का त्वरक

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साप्ताहिक
 
यदि आप स्पैनिश सीखने के बारे में सोचने का प्रयास कर रहे हैं, तो आप गलत कर रहे हैं। स्पैनिश सीखें जैसे आपने हिंदी सीखी: इसे बड़ी मात्रा में सुनकर। (कम से कम एक अस्पष्ट विचार के साथ कि इसका क्या मतलब है!) हजारों स्पेनिश वाक्यांश, हिंदी अनुवादों के साथ, सीधे आपके मस्तिष्क में प्रस्तुत किए जाते हैं: व्यावहारिक से लेकर दार्शनिक से लेकर छेड़खानी तक। केवल वाक्यांश, कोई पूरक नहीं! न केवल संवाद करने के लिए, बल्कि वास्तव में स्पैनिश भाषा में एक दिलचस्प व्यक्ति बनने के लिए स्पैनिश भाषा की बुनियादी बातो ...
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कडक चहा !! आणि एक कथा... A Marathi Podcast of short stories and narrations (fiction and non-fiction) from sometimes well known authors & sometimes from recreational authors but read by amateur or सामान्य माणूस to keep Marathi language alive all-over world. Support this podcast: https://podcasters.spotify.com/pod/show/prashantsarode/support
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Din Bhar

Aaj Tak Radio

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मासिक+
 
Din Bhar is a daily news analysis podcast in Hindi language presented by Aaj Tak Radio. It covers issues ranging from Politics and international relations to health, society, cinema and sports. Did your regular prime time debate miss something that really matters to you? Close your day with Din Bhar, wherein we pick four big news stories of the day and analyse them with help of experts in a manner that is easy to understand. दिन भर के शोर के बाद शाम ढल गई है. हमारे यहां आइए. ख़बरों के सबसे अ ...
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Kahaniyon ka Guccha

ThePodium.in

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मासिक
 
किस्से कहानियाँ हमारी ज़िंदगी का उतना ही अहम हिस्सा हैं, जितना शायद खाना और पीना । कहानियाँ हमें हँसाती हैं, रुलाती हैं, सिखाती हैं। वो बचपन में सुलाती हैं, बड़प्पन में रुलाती हैं। कहानियाँ हमें वहाँ ले जाती हैं, जहां हमें गाड़ी या जहाज़ भी शायद न ले जा पाएँ । तो चलिए हम भी चलते हैं दूर कहीं, कुछ कहानियों के साथ । आप का तहे दिल से स्वागत है इस पॉडकास्ट पर, जिसका नाम है ‘कहानियों का गुच्छा’। इसमें आप सुनेंगे हिन्दुस्तानी ज़बान के प्रसिद्ध लेखकों की कहानियों की कई शृंखलाओं को, जिनको चुना गया है किस ...
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Hey Guys Welcome To The DIGITAL JAYPAL SHOW, Here You Will Get Latest Blogging, SEO And Digital Marketing Tips In Hindi. Jaypal Thakor Is Founder Of "DIGITALJAYPAL.IN" A Small Hindi Blogger . In This Podcast Series Jaypal Will Share Some Blogging, WordPress, SEO, Search Engine Marketing, Internet Marketing, Social Media Marketing, Email Marketing, Email List Building, Content Marketing, Website Engagement, Conversion Optimization And Many Many More In Hindi Language.
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जर्मन शिक्षण त्वरक

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साप्ताहिक
 
यदि आप जर्मन सीखने के बारे में सोचने का प्रयास कर रहे हैं, तो आप गलत कर रहे हैं। जैसे आपने हिंदी सीखी वैसे ही जर्मन सीखें: बड़ी मात्रा में सुनकर। (कम से कम एक अस्पष्ट विचार के साथ कि इसका क्या मतलब है!) हजारों जर्मन वाक्यांश, हिंदी अनुवादों के साथ, सीधे आपके मस्तिष्क में प्रस्तुत किए जाते हैं: व्यावहारिक से दार्शनिक तक और छेड़खानी तक। केवल वाक्यांश, कोई पूरक नहीं! न केवल संवाद करने के लिए, बल्कि वास्तव में जर्मन में एक दिलचस्प व्यक्ति बनने के लिए जर्मन भाषा की बुनियादी बातों से आगे बढ़ें। जर ...
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बंगाली सीखने का त्वरक

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साप्ताहिक
 
यदि आप बांग्ला सीखने के बारे में सोचने का प्रयास कर रहे हैं, तो आप गलत कर रहे हैं। बांग्ला सीखें जैसे आपने हिंदी सीखी: बड़ी मात्रा में सुनकर। (कम से कम एक अस्पष्ट विचार के साथ कि इसका क्या मतलब है!) हजारों बंगाली वाक्यांश, हिंदी अनुवादों के साथ, सीधे आपके मस्तिष्क में प्रस्तुत किए जाते हैं: व्यावहारिक से दार्शनिक तक और छेड़खानी तक। केवल वाक्यांश, कोई पूरक नहीं! न केवल संवाद करने के लिए, बल्कि वास्तव में बंगाली में एक दिलचस्प व्यक्ति बनने के लिए बंगाली भाषा की बुनियादी बातों से भी आगे बढ़ें। ...
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फ़्रेंच शिक्षण त्वरक

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साप्ताहिक
 
यदि आप फ़्रेंच सीखने के बारे में सोचने का प्रयास कर रहे हैं, तो आप ग़लत कर रहे हैं। जैसे आपने हिंदी सीखी वैसे ही फ्रेंच सीखें: बड़ी मात्रा में सुनकर। (कम से कम एक अस्पष्ट विचार के साथ कि इसका क्या मतलब है!) हजारों फ्रेंच वाक्यांश, हिंदी अनुवादों के साथ, सीधे आपके मस्तिष्क में प्रस्तुत किए जाते हैं: व्यावहारिक से दार्शनिक तक और छेड़खानी तक। केवल वाक्यांश, कोई पूरक नहीं! न केवल संवाद करने के लिए, बल्कि वास्तव में फ्रेंच भाषा में एक दिलचस्प व्यक्ति बनने के लिए फ्रेंच भाषा की बुनियादी बातों से भ ...
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कोरियाई शिक्षण त्वरक

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यदि आप कोरियाई सीखने के बारे में सोचने का प्रयास कर रहे हैं, तो आप गलत कर रहे हैं। कोरियाई भाषा सीखें जैसे आपने हिंदी सीखी: बड़ी मात्रा में सुनकर। (कम से कम एक अस्पष्ट विचार के साथ कि इसका क्या मतलब है!) हजारों कोरियाई वाक्यांश, हिंदी अनुवादों के साथ, सीधे आपके मस्तिष्क में प्रस्तुत किए जाते हैं: व्यावहारिक से दार्शनिक तक और छेड़खानी तक। केवल वाक्यांश, कोई पूरक नहीं! न केवल संवाद करने के लिए, बल्कि वास्तव में कोरियाई भाषा में एक दिलचस्प व्यक्ति बनने के लिए कोरियाई भाषा की बुनियादी बातों से आ ...
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अंग्रेजी सीखने का त्वरक

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साप्ताहिक
 
यदि आप अंग्रेजी सीखने के बारे में सोचने का प्रयास कर रहे हैं, तो आप गलत कर रहे हैं। अंग्रेजी सीखें जैसे आपने हिंदी सीखी: इसे बड़ी मात्रा में सुनकर। (कम से कम एक अस्पष्ट विचार के साथ कि इसका क्या मतलब है!) हजारों अंग्रेजी वाक्यांश, हिंदी अनुवादों के साथ, सीधे आपके मस्तिष्क में प्रस्तुत किए जाते हैं: व्यावहारिक से दार्शनिक तक और छेड़खानी तक। केवल वाक्यांश, कोई पूरक नहीं! न केवल संवाद करने के लिए, बल्कि वास्तव में अंग्रेजी में एक दिलचस्प व्यक्ति बनने के लिए अंग्रेजी भाषा की बुनियादी बातों से आग ...
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Soul Portrait

Soul Portrait

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रोज+
 
An Alternative | Experimental Rock Band hailing from Himachal Pradesh, India. The band Soul Portrait made its way initially with three of it's members Hitesh, Bhavtosh and Ashwani in the Autumn of 2012. After quite a few months the band felt the need of expanding it's line up which led to the addition of Anirudh, Khushal and Karan to the existing line up. The band primarily focuses on hunting for the most pleasing melodies and sounds. Technicalities have never been the priority of the band, ...
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==== भारतीय प्रचलित भाषा जिनके एक लाख से दस लाख वक्ता (३०-६०) - "खुशखबरी", "जीवन के शब्द", "इँजील गीत" ==== (कुई, गारो, त्रिपुरी (कोक बोरोक), मिजो, हल्बी, कोरकू, मिरी, मुंडारी, कार्बी, कोया, आओ नागा, सावरा, कोन्याक नागा, खड़िया, अंग्रेजी, माल्टो, न्याशी, आदि, थडौ (कुकी), लोथा, कूर्गी, राभा, तंगखुल, मैथिली, अंगामी, फोम नागा, कोलामी, कुवी, दिमासा, लद्दाखी, सुमी) ==== INDIAN POPULAR LANGUAGES THAT HAVE 100,000 TO ONE MILLION SPEAKERS(FROM No.30 TO No.60) - "GOOD NEWS","WORDS OF LIFE" ."GOSPEL S ...
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show series
 
१८५७ तमे वर्षे कोलकाताविश्वविद्यालयतः बि.ए परीक्षायाम् अधिकान् अङ्कान् प्राप्तवन्तं बङ्किमचन्द्रवर्यं तदानीन्तनः राज्यपालः हालेण्ड्-वर्यः स्वगृहम् आहूतवान् । ततः 'भवान् अद्य आरभ्य उपदण्डाधिकारिरूपेण कार्यारम्भं करोतु' इति बङ्किमचन्द्रम् उक्तवान् । परन्तु बङ्किमचन्द्रः राज्यपालाय धन्यवादान् समर्प्य अवद्त् 'उद्योगस्वीकारविषये मया मम पिता प्रष्टव्यः ।…
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कदाचित् मोहननामकः कश्चित् यदा धनार्जनं कृत्वा स्वग्रामं प्रति आगच्छन् आसीत् तदा कश्चन वञ्चकः तम् अनुसृतवान् । रात्रौ कस्यांचन धर्मशालायांं भोजनं कृत्वा शयनम् अकुरुताम् । मध्यरात्रे वञ्चकः मोहनस्य पोटलीवस्त्रम् उद्घाट्य ज्ञातवान् यत् तत्र धनं नास्ति इति । एवमेव अग्रिमदिने अन्यस्यां धर्मशालायाम् अपि वञ्चकेन मोहनस्य धनं न प्राप्तम् । एतस्य समीपे धनमेव…
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मेहरबां हुआ वक़्त और हसरतें भी लम्हा लम्हा चाहतों में टूटी सरहदें भी रतजगों में बीती ना जाने कितनी रातें दिन के उजालों में बेहिसाब बातेँ बातेँ करार की और इक़रार की पहली नजर के पहले प्यार की....द्वारा Dr. Rajnish Kaushik
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महाविद्यालयस्य कश्चन अध्यापकः देवदत्तः ईश्वरदर्शनं कर्तुं वाञ्च्छन् कस्यचन साधोः समीपं गच्छति । साधुः देवदत्तस्य सहनाशक्तेः परीक्षां करोति । यतः सहनां विना किमपि सिद्ध्यति न लोके । अन्ते महात्मना 'भगवान् बहिः कुत्रापि नास्ति । स तु निर्धनानां रुग्णानां पीडितानां च हृदये निवसति.....’ इत्यादि वचनैः देवदत्तः बोधितः । तस्मात् क्षणात् देवदत्ते विवेकः सम…
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कस्यचन धनिकस्य गृहे विवाहप्रसङ्गे कश्चन लघुः बालकः रोदिति स्म । रोदनं कुर्वतः बालस्कय कर्मकरी माता पात्राणि प्रक्षालन्ती आसीत् । केचन आगत्य तस्य समाधानं कर्तुं प्रायतन्त । किन्तु तस्य बालकस्य रोदनं न समाप्तम् । तदनन्तरं तस्य माता आगत्य पुत्रम् उन्नीय तस्य केशेषु हस्तं प्रसार्य 'हुलुलुलु' इति उक्तवती येन सः शीघ्रमेव प्रसन्नः जातः । तदा तत्र स्तिथः क…
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कदाचित् राजसभायां मरणदण्डं प्राप्तवता बन्धिना राजा अवाच्यशब्दैः निन्दितः । तस्य वचनानि अनवगच्छन् राजा पार्श्वस्थान् अपृच्छत् 'किं वदन्नस्ति सः?’ इति । कश्चन चतुरः मन्त्री अवदत् 'स्वस्य आक्रोशम् असमाधनञ्च निगृह्य अन्येषां दोषं यः‌ क्षामयति स एव श्रेष्ठः' इति । राज्ञि करुणा उत्पन्ना । मरणदण्डनम् अपाकृतवान् च । अपरः मन्त्री अवदत् 'राज्ञः सन्निधौ असत्य…
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कदाचित् किञ्चन विशालम् उद्यानं वातगोलकविक्रेता आगच्छत् । विविधवर्णीयानि चित्रयुतानि अनिलगोलकानि बालकाः क्रीत्वा, उड्डीयमानानि तानि दृष्ट्वा हसन्ति नृत्यन्ति च । तत्रत्याः बालकाः, वृद्धा, विक्रेता इत्यादयः सर्वे जनाः श्वेतवर्णीयाः एव । तस्मिन्नेव उद्याने कश्चन कृष्णवर्णीयः सप्तवर्षीयः निग्रोबालकः दूरतः एव वातगोलकानि पश्यति । अमेरिकादेशे गौरवर्णीयाः …
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कदाचित् आखेटाय गतवता चन्दनपुरस्य दयावता राज्ञा उसमानेन किञ्चिदपि न लब्धम् । पिपासया व्याकुलेन तेन कुत्रापि जलं न प्राप्तम् । सः भूमौ पतितः । कश्चन कृषिकः राजानं गृहम् आनाय्य जलभोजनादिकम् अयच्छत् । कृषकस्य सेवातः सन्तुष्टः राजा तस्मै किमपि दातुम् ऐच्छत् । यदि किमपि आवश्यकं भविष्यति तर्हि भवतः प्रासादम् आगमिष्यामि इति उक्तवान् कृषकः । अग्रे कदाचित् र…
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कदाचित् किञ्चन यात्रिकदलं मरुस्थलम् अतिक्रामत् आसीत् । तस्मिन् मरुस्थले जलं, भोजनादिकं किमपि न असीत् तस्य दलस्य सदस्यानां निकटे । एकस्मिन् स्थले ते बहूनि फलानि धारयतः वृक्षान् दृष्ट्वा सर्वे अपि वृक्षं प्रति अधावन् । तदा दलनायकः तान् निरुद्ध्य तानि फलानि उपयोगयोग्यानि वा न वा इति परीक्षां कृतवान् । तदा तैः ज्ञातं यत् तानि फलानि विषयुक्तानि इति । एव…
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कदाचित् लुण्ठाकाः कञ्चित् बौद्धभिक्षुम् आक्रम्य दण्डेन विध्यन्तः कर्णम् आकर्षन्तः विचित्रं मनोरञ्जनं प्राप्नुवन्ति स्म । तद् दृष्टवतः भिक्षोः नेत्रे अश्रुधारापूर्णे जाते । रोदनशीलं भिक्षुं दृष्ट्वा ते उपहासं कृतवन्तः । तदा भिक्षुः अवदत् 'अहं भवतः निमित्तीकृत्य रोदिमि । आरोग्यवन्तः बुद्धिमन्तः अस्य देशस्य निर्मातारः भवन्तः । तत्कार्यं विहाय ईदृशेषु …
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क्या हुआ जो इस बरस भी आरजू ए मोहब्बत पूरी ना हो सकी .... क्या हुआ जो दरमियाँ उसके और तुम्हारे खत्म दूरी ना हो सकी ... इश्क़ तो है ना तुम्हें उससे और उम्मीदे वफा भी... इसलिए सब्र करो वो दौर भी आयेगा... जब होगा मेहरबां वक़्त भी और महबूब भी दौड़ा चला आयेगा... इसलिए ना हो उदास, ना डूबो गम के अँधेरों में... ये मिजाज ए हुस्न है पल पल बदलता रहेगा, ये सिलस…
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कस्यचन वृद्धस्य एकः पुत्रः अलसः अपरः च श्रमजीवी असीत् । मरणात् पूर्वमेव गृहक्षेत्रादीनां विभागं कृत्वा पुत्रौ आहूय यथाशक्ति बोधितवान् - छायायां चैव गन्तव्यम् आगन्तव्यमं तथैव च । मिष्टान्नं भक्षयेन्नित्यं ततो लक्ष्मीकृपा भवेत् ।। पित्रा बोधिता नीतिः एका एव । उभौ अपि पुत्रौ स्वमत्यनुगुणं तस्य अर्थम् अवगत्य तदनुगुणम् एव फलं प्राप्तवन्तौ । यः उत्तमं जी…
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वो लम्हे जो दर्द थे तेरा वो लम्हे जो फर्ज थे मेरा निभाये जो आँसुओं की धार में वो लम्हे जो मुझपे कर्ज़ थे तेरा.... मगर कह के एहसां , जता दिया तूने अपनों की फ़ेहरिस्त से हटा दिया तूने हुस्न और इश्क़ की जद्दोजहद में मैं गैर हूँ तल्ख लहजे में बता दिया तूने... फिर भी मैं दहकता रहा उसी आग में गाता रहा तुझी को ग़मों के साज़ में घुटता रहा- मरता रहा- रहा फि…
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चीनादेशस्य कैसाकनामकस्य श्रेष्ठचर्मकारस्य एकमात्रपुत्रः चुवाङ्गः कुलवृत्तिम् उपेक्ष्य स्वच्छन्दं मित्रैः सह अटति स्म । तेनैव मनोरोगेण पीडितः सन् अल्पेषु एव दिनेषु कैसाकः दिवं गतः । स्वेच्छाचारी चुवाङ्गः कैसाकस्य अर्जितं सर्वं धनं व्ययीकृतवान् । कदाचित् राजा तम् आनाय्य 'राज्ञीवासजनेभ्यः सुन्दरीः पादरक्षाः सीवयित्वा ददातु' इति अवदत् । पितृवाक्यस्य उप…
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कदाचित् निर्धनः देवदत्तः धनार्जनाय पत्नीपुत्रैः सह वनं गत्वा एकस्य वृक्षस्य अधः उपविश्य रज्जुनिर्माणम् आरब्धवान् । पत्नी पुत्रौ च विविधानां वृक्षाणां त्वचः सङ्गृह्य आनीतवन्तः। स्वकार्ये दत्तचित्तान् जनान् दृष्ट्वा तस्मात् वृक्षात् एकः यक्षः प्रत्यक्षीभूय अपृच्छत् 'भवन्तः अत्र किं कुर्वन्ति?’ इति । यद्यपि देवदत्तः भीतः तथापि धैर्येण अवदत् 'भवतः पादब…
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भगवान् बुद्धः पूर्वस्मिन् जन्मनि बोधिसत्त्वनामकः क्रीडनकविक्रेता आसीत् । अन्यः अपि विक्रेता आसीत् यः स्वभावेन दुष्टः वञ्चकः च । कदाचित् दुष्टः क्रीडनकविक्रेता एकस्य गृहस्य पुरतः आगतः तदा काचित् बाला 'क्रीडनकं दापयतु' इति वृद्धाम् अपृच्छत् । वृद्धा एकां पुरातनीं स्थालिकाम् आनीय स्थालिकायाः विनिमयेन एकं क्रीडनकं यच्छ इति क्रीडनकविक्रेतारम् अयाचत । 'त…
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कदाचित् महान्-विष्णुभक्तः राजा अम्बरीषः साधनद्वादशीव्रतम् आरब्धवान् । इन्द्रः तस्य व्रतस्य भङ्गार्थं महातपस्विनं दूर्वासमुनिं नियोजितवान् । सप्तसहस्रेण शिष्यैः सह आगतस्य मुनिवरस्य विशेषसत्कारं कृतवान् अम्बरीषः । दूर्वासमुनिः शिष्यैः सह आह्निकादिकं कर्तुं नदीं गत्वा सोद्देशम् एव शीघ्रं न आगतः । द्वादश्याः सूर्योदयसमयः आसन्नः आसीत् । व्रतभङ्गः न भवेद…
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इस एपिसोड में हम सुनते हैं महायुद्ध के सबसे निर्णायक क्षण की कहानी, जब धर्म और कर्तव्य आमने-सामने खड़े होते हैं। कर्ण का वध होते ही युद्ध की दिशा हमेशा के लिए बदल जाती है और कौरव पक्ष भीतर से टूट जाता है। इसके बाद अठारहवें दिन का आरंभ होता है, जहाँ एक-एक करके अंतिम प्रमुख योद्धाओं का पतन होता है। यह एपिसोड महाभारत के अंतिम अध्याय की नींव रखता है।…
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कदाचित् प्रसीदः प्रजापतिः सहभोजम् आयोजितवान् यत्र देवाः दानवाः चा निमन्त्रिताः । परस्परं कलहादिकं कुर्युः इति भीत्या तेषां पृथक्-पृथक् भोजनव्यवस्था कृता । प्रासादस्य प्रवेशद्वारे आगन्तुकानां द्वावपि हस्तौ एकैकेन काष्ठपट्टकेन हस्तं वस्त्ररज्जुभिः च बद्धवा तेषां तेषां भोजनस्थलस्य मार्गं दर्शितवन्तः । प्रथमं दानवभोजनकक्षं गतवान् प्रजापतिः । स्वमुखे ग्…
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कस्मिंश्चित् वनप्रदेशे पुष्पिकाणां राज्ञी अतीव लावण्यवती अपि रूपगर्विता, व्यवहारेण सा अतिक्रूरा च आसीत् । मायया सा अप्सरसः रूपं धृत्वा मृगयार्थं वनप्रदेशम् आगतान् राजकुमारान् विलोभ्य तान् अङ्गुष्ठमात्राकारेण कृत्वा स्वर्णपञ्जरे स्थापयति स्म । तान् विविधान् नृत्यप्रकारान् अध्यापयति स्म । यदि नृत्यं न कुर्वन्ति तर्हि स्वर्णसूचिकया विद्ध्वा पीडयति स्म…
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कदाचित् कश्चन चोरः राजभटेभ्यः आत्मानं रक्षितुं किञ्चित् गृहं प्रविष्टवान् । स्वेन नीतां ग्रन्थिं मञ्चस्य उपरि संस्थाप्य, आत्मानं कम्बलेन आच्छाद्य तत्र शयितेन जनेन सहैव शयितवान् । तौ द्वौ अपि राजभटैः महाराजस्य समीपं नीतौ । द्वौ अपि 'अहं चोरः न' इति अवदताम् । महाराजः महान् प्राज्ञः न्यायप्रियश्च । अस्यां समस्यां परिहारः कथं करोति ? केनोपायेन दोषिणं ग…
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कदाचित् जन्मना बधिरः कश्चन आचार्यः स्वस्य बधिरतायाः औषधार्थं शान्तिशिवनामकं स्वभावमूढं शिष्यम् आहूय 'वैद्यसमीपं गत्वा मम बधिरत्वस्य औषधम् आनयतु' इति अवदत् । शान्तिशिवः यदा वैद्यस्य गृहं प्राप्तवान् तदा विलम्बेन आगतं पुत्रं दृष्ट्वा क्रुद्धः वैद्यः हस्तपादं रज्ज्वा बद्ध्वा स्तम्भे बन्धनं कृत्वा दण्डेन ताडनम् आरब्धवान् । सर्वं दृष्ट्वा शान्तिशिवः आचा…
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कदाचित् इन्द्रः अन्येषाम् अपेक्षया मया सहस्राधिकानि पुस्तकानि पठितानि इति गर्वितः जातः । तद्दिनादारभ्य सः कमपि न परिगणयति स्म । इन्द्रस्य गर्वं दूरीकर्तुं भगवान् नारायणः नारदं स्वर्गलोकं प्रति प्रेषितवान् । नारदमहर्षेः स्वागतं कृतम् इन्द्रेण । तयोः सम्भाषणावसरे तालग्रन्थानां राशिः उद्भूतः तत्र । 'किमिदम्?’ इति इन्द्रेण पृष्टे नारदः अवदत् 'एतानि भवत…
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कश्चन दयावान् न्यायप्रियः राजा तस्य पत्नी च स्वप्रजाजनान् पुत्रान् इव प्रीत्या पालयतः । नृपस्य प्रासादसमीपस्थस्य आम्रवृक्षस्य फलानि अत्यन्तं मधुराणि रसपूर्णानि च भवन्ति स्म । एकदा राज्ञ्याः दासी नृपं स्वमात्रे एकं फलम् अयाचत । तस्य फलस्य खादनेन अतीव सन्तुष्टा सा वृद्धा 'सः वृक्षः मम उद्याने भवतु' इति विचिन्त्य द्वौ मल्लौ तथैव आज्ञापितवती । रात्रौ व…
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कस्मिंश्चित् उत्सवे साम्प्रदायिकरीत्या भोजनालये भूमौ पङ्क्तिरूपेण कदलीदलानि स्थापितानि आसन् । भोजनम् आरब्धम् । भोज्यपदार्थानां भागत्वेन बीजोपेतपक्वाम्रफलनिर्मितः कश्चन पदार्थविशेषः आसीत् । कश्चित् भक्ष्यलोलुपः आम्रफलं हस्तेन सम्पीड्य तस्य रसं यदा आस्वादयन् आसीत् तदा आम्रफलस्य बीजं तस्य हस्तात् स्खलितं सत् पार्श्वे उपविष्टस्य दले न्यपतत् । यदा भक्ष्…
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श्रीरामः वनवासगमनात् पूर्वम् अयोध्यावासिभ्यः भूरिदानं कर्तुम् ऐच्छत् । दानविषये श्रुतवती त्रिजटनामकस्य निर्धनब्राह्मणस्य पत्नी श्रीरामं दानं याचतु इति पतये सानुरोधम् उक्तवती । झटिति त्रिजटः गत्वा यदा दानम् अयाचत तदा श्रीरामः विहस्य तस्मै एकं दण्डं दत्त्वा 'दण्डं बलात् क्षिपतु । यत्र पतिष्यति तावतपर्यन्तायां भूम्यां स्थिताः गावः भवदीयाः भविष्यन्ति' …
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भगवान् चन्द्रः अतीव मनोहरः इति कारणेन दक्षप्रजापतिः स्वस्य सप्तविंशतिं पुत्रीः चन्द्रेण सह परिणायितवान् । पत्नीषु अन्यतमायां रोहिण्यां चन्द्रस्य गाढा प्रीतिः अस्ति इति कारणतः अन्याः स्वपितुः समीपं गत्वा चन्द्रः अस्मान् उपेक्षते इति अवदन् । पुत्रीणां विषये चन्द्रेण क्रियमाणम् अन्यायपूर्वकं व्यवहारं दृष्ट्वा 'भवान् क्षयरोगग्रस्तः सन् क्षीयताम्' इति श…
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तीर्थयात्रासमये कश्चन धनिकः वृद्धः कस्यचन निर्धनस्य युवकस्य सेवातः सन्तुष्टः भूत्वा स्वकन्यां तुभ्यं ददामि इति वृन्दावने गोपालस्य पुरतः अवदत् । गृहगमनानतरं एतत् प्रस्तावं वृद्धस्य पुत्रः निराकरोत् । अतः यदा तरुणः विवाहविषये अपृच्छत् तदा वृद्धः 'अहं किमपि न स्मरामि' इति अवदत् । वृद्धस्य पुत्रः दोषारोपणं यदा अकरोत् तदा तरुणः अवदत् यत् भवतः पिता गोपाल…
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मिथिलायाम् ईश्वरस्य गङ्गामातुः च आराधकः विद्यापतिनामकः कश्चन कविः । स्वस्य अन्तिमकालः सन्निहितः इति तेन ज्ञातम् । गङ्गायाम् एव देहत्यागः भवतु इति तस्य प्रार्थना आसीत् इत्यतः चत्वारः तं दोलायां‌ संस्थाप्य 'सिमारिया घट्टं' प्रति प्रस्थितवन्तः । इतोऽपि किलोमीटर् -त्रयम् अतिक्रान्तव्यमिति विद्यापतिना ज्ञातम् । किन्तु अन्तिमकालः सन्निहितः इति ज्ञात्वा त…
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काचन लोकोक्तिः श्रूयते -’सिद्धिः सदा अस्माकं चिन्तनम् अवलम्बते' इति । कदाचित् अनावृष्ट्या सरोवरस्थानां जलचराणां मरणम् आरब्धम् । तत्रत्याः भीताः त्रयः मण्डूकाः अन्यत् जलस्थानम् अन्विष्यतः अग्रे अचलन् । किन्तु तैः कुत्रापि जलस्रोतः न प्राप्तम् । अग्रे कश्चन कूपः दृष्टः । प्रथमः वदति अत्र अवतरामः इति । द्वितीयः वदति अन्धकारकारणतः कूपे जलम् अस्ति वा न …
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पूर्वं कश्चन प्रतीपनामा राजा आसीत् यस्य देवापिः, शन्तनुः, बाह्लीकः चेति त्रयः पुत्राः आसन् । ज्येष्ठः देवापिः श्वेतकुष्ठरोगग्रस्तः इति कारणतः प्रतीपे दिवङ्गते द्वितीयः पुत्रः शन्तनुः सिंहासनम् आरूढवान् । शन्तनुः यद्यपि धर्मेण एव राज्यं पालितवान् तथापि द्वादशवर्षाणि यावत् वृष्टिः एव न जाता । कारणम् आसीत् यत् ज्येष्ठपुत्रे सति अनन्तरजः सिंहासनम् आरूढ…
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कहते हैं कि वक़्त आदतन चीजों को संयमित कर देता है , मगर इंतजार...जो प्यार में होता है किसी का, वह अपनी जगह ढीठ बना रहता है, शून्य और अनंत के बीच फैले रिक्त स्थानो में...यह सोच कर कि तुम आओगी और पढ़़ोगी मेरी आँखों में लिखी वो सारी प्रार्थनाएं, जो ईश्वर से करता रहता हूँ मौन की डोर पकड़ कर...इस ख्याल से भी कि किसी तरह दिल बहल जाये, इन्तज़ार के पल ढल ज…
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डा. राजेन्द्रप्रसादस्य गान्धिवर्यस्य च एकदा मेलनं जातम् । गान्धिविषये विशेषाभिमानः आसीत् राजेन्द्रप्रसादस्य । चम्पारणीयकृषिकाणां विषये शुल्कं विना न्यायालये वादं कृत्वा राजेन्द्रप्रसादः तेषां पक्षे समुचितं कार्यं करोति इति गान्धिना ज्ञातम् । सम्भषणसमये 'समग्रे देशे जनाः दुराचारविषयतां गताः सन्ति । तेषां विषये कः सङ्घर्षं कुर्यात् ....’ इति राजेन्द्…
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रोमहर्षनामा कश्चन वणिक् विदेशगमनात् पूर्वं स्वधनं रक्षितुं मित्रं लोभनाथं याचितवान् । दीर्घकालानन्तरं रोमहर्षः प्रत्यागत्य स्वधनं प्रत्यर्पितुम् अवदत् किन्तु धनं बहोः कालात् पूर्वमेव प्रत्यर्पितवान् इति असत्यम् अवदत् लोभनाथः । ततः ताभ्यां न्यायालयं प्रति गतम् । तत्र कस्यचन आसन्दस्य दक्षिणभागे प्रतिनिबद्धः तीक्ष्णः खड्गः अपराधिनः सत्यतायाः परीक्षां …
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कश्चन पिता पुत्रस्य अध्ययनाय उत्तमं प्रयासं कृतवान् । पुत्रः अपि उत्तमम् अध्ययनं कृत्वा उद्योगे सफलः अभवत् । विवाहः अपि सम्पन्नः । सः संस्थायाः प्रमुखः अपि अभवत् । कदाचित् पिता कार्यालयं गत्वा पुत्रं दृष्ट्वा सन्तुष्टः अभवत्, प्रश्नम् अपृच्छत् 'एतस्मिन् प्रपञ्चे शक्तिशाली जनः कः?'। पुत्रः स्वम् एव शक्तिशालिनम् अवदत्, यत् श्रुत्वा पितुः मुखं म्लानं …
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आज के एपिसोड में हम सुनेंगे उस निर्णायक मोड़ की कहानी, जहाँ अर्जुन और कर्ण पहली बार पूरे तेज़ और क्रोध के साथ आमने-सामने आए। अभिमन्यु के प्रतिशोध और वृशसेन वध के बाद यह युद्ध केवल रण नहीं रहा—यह दो जीवनभर के दर्द, शापों और अधूरे वचनों की भिड़ंत बन गया। दिव्यास्त्रों की वर्षा, कृष्ण की रणनीति और कर्ण के शापित दुर्भाग्य ने इस संग्राम को इतिहास का सबस…
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कस्मिंश्चित् गुरुकुले शिक्षकस्य आवश्यकता आसीत् । तदर्थं त्रयः अभ्यर्थिनः उपस्थिताः । आचार्यः जवनिकायाः पृष्ठतः स्थित्वा प्रश्नं कृतवान् "ज्ञानं प्रमुखम् उत छात्रप्रीतिः?" प्रथमः ज्ञानस्य प्राधान्यम् उक्तवान्, द्वितीयः उभयोः महत्त्वम् अङ्गीकृतवान् । तृतीयः छात्रप्रीतिः प्रमुखा इति मत्वा, ज्ञानं प्रयत्नेन अपि वर्धयितुं शक्यम् इति अवदत् । गुरुणा पुनः …
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कदाचित् मालवादेशस्य नृपतिः सुबेदारः मल्हाररावहोलकरः, पट्टमहिषी गौतमबायी, तनयः खण्डेरावहोलकरः च 'चौण्डि' नामके ग्रामे प्रवासरतः आसन् । तदा कस्यचन देवालयस्य कलशस्थापनार्थं राज्ञी समाहूता । यदा पूजाकार्याणि आरब्धानि तदा सहसा तत्र जलोद्भवः अभवत् । यदा राज्ञी अर्चकैः सूचिते गर्ते पवित्रां शिलां स्थापयितुम् ऐच्छत् तदा कस्याश्चित् बालिकायाः ध्वनिः श्रुतः …
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कश्चन महाधनिकः कस्यचन रत्नविक्रेतुः आपणं गत्वा अधिकमूल्ययुक्तानि रत्नानि दर्शयितुम् उक्तवान् । रत्नविक्रेता दर्शितवान् । इतो‌Sपि अमूल्यानि रत्नानि दर्शयताम् इति पृष्टे विक्रेता अवदत् यत् अन्यस्मात् प्रकोष्ठात् आनयामि इति । यदा अन्यस्मिन् प्रकोष्ठे विक्रेता प्रविष्टः, सुप्तः पिता दृष्टः तेन । सुप्तः पिता यावत् न जागृयाद् तावत् कवाटोद्घाटनं कर्तुं न …
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कदाचित् कश्चन महात्मा कस्यचन निर्धनगृहस्य पुरतः स्थित्वा भिक्षां याचितवान् । तदा तस्मिन् गृहे काचित् बालिका अवदत् 'गृहे दानयोग्यं किमपि नास्ति' इति । महात्मा अवदत् 'दानक्रिया एव मुख्या । मूल्यं वस्तुनि नास्ति, भावे एव अस्ति । गृहस्य पुरतः स्थितां धूलिमपि दातुं शक्यते' इति । बालिका श्रद्धया धूलिं गृहीत्वा महात्मनः पात्रे न्यवेशयत् । एतत् दृष्ट्वा शि…
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तेरी यादों में जलकर ये अहसास हुआ कि आग हो या प्यास...पानी से नहीं बुझती.... इसलिए ...मैं और मेरी तन्हाई...अक्सर ये बातेँ करते हैं कि... तुम होतीं ... तो कभी आँखों से पीते, कभी लबों से पीते... पैमाने मोहब्बतों वाले... हर ज़ाम में तेरी प्यास होती, हर घूंट में तेरी खुशबू हम घूंट- घूंट पीते पैमाने... मोहब्बतों वाले..... तुम होतीं... तो हर रात ये चांद भ…
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कश्चन महात्मा आश्रमम् आगतान् भक्तान् स्वागतीकृत्य भोजनाय निमन्त्रितवान् । भोजनसमये सः महात्मा अवदत् 'मानवस्य आहारसेवनक्रमः पशूनामिव स्यात् । पशवः केवलं बुभुक्षायां सत्याम् एव खादन्ति । भगवता विहितम् आहारम् एव सेवन्ते । मानवः तु बुभुक्षायाम् अजातायाम् अपि खादति, विवाहादौ मितम् अतिक्रम्य भोजनं करोति, स्वस्य आरोग्यं नाशयति । स्वास्थ्यरक्षणं मानवाधीनम्…
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कदाचित् कश्चन धनिकः कस्यचन उत्कृष्टकलाकारस्य समीपं गत्वा स्वस्य चित्रं लेखयितुम् प्रार्थितवान् । चित्रकारेण चित्रं लिखितं, किन्तु धनिकः सादृश्यरहितताम् आरोप्य चित्रं न क्रीतवान् । चित्रकारेण द्वितीयम् उत्कृष्टं चित्रम् अपि लिखितम् । तदपि चित्रं धनिकः निराकृतवान् दोषान् प्रदर्श्य । खिन्नः चित्रकारः मित्रेण सह विचार्य धनिकस्य गृहं गत्वा अवदत् 'यतो हि…
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राज्यस्य उत्तराधिकारिणं प्राप्तुं योग्यतापरीक्षार्थं कश्चन राजा तस्य पुत्रं कस्यचन महात्मनः समीपं प्रेषयति । समग्रं दिनम् अरण्ये उषित्वा राजकुमारः अनुभवम् अकथयत् - 'गजानां घीङ्कार श्रुतः, महावृक्षस्य पतनं दृष्टं, मेघघर्जनं श्रुतं, तडितः दृष्टाः च' इति । अग्रिमवर्षे आगच्छ इति महात्मा वदति । अनन्तरवर्षे राजकुमारः वदति 'मूषकं गिलन् सर्पः दृष्टः, मूषकस…
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एषा कथा पञ्चदशे अथवा षोडशे शतके घटिता, यत्र श्रीकृष्णचैतन्यनामकः कश्चन मेधावी न्यायशास्त्रविद् भागवतभक्तः वैष्णवाचार्यः अभवत् । सः चैतन्यमहाप्रभुः इत्यपि प्रसिद्धः । तस्मिन्काले वासुदेवनामकः कश्चन कृष्णभक्तः कुष्ठरोगेण पीडितः आसीत् । एकदा चैतन्यमहाप्रभुः दक्षिणभारतयात्रां कुर्वन् कूर्मनामकस्य ब्राह्मणस्य गृहे वासं कृतवान् । श्रुतवार्तः वासुदेवः परि…
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काचित् माता पनसफलं कर्तयित्वा फलदलानि पञ्च द्रोणेषु स्थापयति । तस्याः पुत्रः अचिन्तयत् यत् माता मह्यम् एकं द्रोणं ददाति इति । किन्तु एकं द्रोणं भगवते समर्प्य आगच्छ इति वदति माता । अवशिष्टेषु द्रोणत्रयं ज्येष्ठपितृव्यायै कनिष्ठपितृव्यायै प्रतिवेशिन्यै वृद्धायै च दत्त्वा आगच्छ इति वदति । म्लानमुखः बालकः यदा प्रत्यागच्छति तदा अन्तिमद्रोणतः एकं‌ फलदलं …
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मनुष्येषु विभिन्नता भवत्येव । केषुचित् दोषरूपाणि छिद्राणि भवन्ति । तेषां छिद्राणां द्वारा दुष्प्रवृत्तयः तान् प्रविशन्ति । ततः तेषां पतनं भवति । ये दोषरहिताः स्युः, येषु दुष्प्रवृत्तीनां प्रवेशाय अवसरः न स्यात्, ते कामपि हानिम् अप्राप्नुवन्तः उत्तमं जीवनं यापयन्ति । एकैकस्यापि जनस्य आन्तरस्वरूपं विभिन्नं भवति इत्यतः तत्तस्य जीवनम् अपि विभिन्नं भवति…
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कदाचित् वङ्गप्रदेशात् कालिचरणनामकः कश्चन भगवद्भक्तः चम्पानगर्यां स्थितं विष्णुदेवालयम् आगतः । महत्याः वृष्ट्याः उपशान्तेः अनन्तरं सः भक्त्या कर्दमपूर्णे मार्गे नृत्यं कुर्वन् अग्रे अगच्छत् । तदवसरे तस्य पादक्षेपेण उत्थितः कर्दमः कस्याश्चित् महिलायाः शाटिकां पतितः इति कारणेन तस्याः पतिः क्रोधेन दुर्वचनानि वदन् कालिचरणं प्रहृतवान् । कालिचरणः कारणम् अ…
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कदाचित् डा.रघुवीरः प्रवासावरे एकस्मिन् फ्रेञ्च्-जनस्य गृहे अतिथित्वेन वासम् अकरोत् । तदवसरे भारतात् आगतम् आङ्ग्लभाषया लिखितं पत्रं दृष्ट्वा गृहस्वामिनः पुत्री पृच्छति 'किमर्थं आङ्ग्लभाषया व्यवह्रियते ? स्वीया लिपिः भाषा वा नास्ति वा?’ इति । एतां घटनां ज्ञातवत्या बालिकायाः मात्रा उक्तम् - 'देशाभिमानः भाषाभिमानः च यस्य न स्यात् तं बर्बरं भावयामः वयम्…
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कस्याञ्चित् कक्ष्यायां कश्चन अध्यापकः छात्रान् अपृच्छत् 'वृक्षस्य एकैकः भागः अपि भवति महते प्रयोजनाय । भवत्सु कः कीदृशः वृक्षभागः भवितुम् इच्छति ?’ इति । तदा एकैकः छात्रः‌ अपि तस्य इच्छानुगुणं कीदृशः भागः भवितुम् इच्छति इति । तस्य भागस्य प्रयोजनं किम् इत्यपि वदति । कश्चन पर्णं, कश्चन पुष्पं, कश्चन फलं, कश्चन शाखा भवितुम् इच्छामि इति वदति । कक्ष्याय…
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