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Pratidin Ek Kavita

Nayi Dhara Radio

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रोज
 
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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AZAD HIND: The Bhagat Singh Story | India's Fight for Freedom

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साप्ताहिक+
 
Bharat ki azaadi ki ladai ke ek amar krantikari ki kahani, ab sunayi jaayegi Tirange ki zabaani. Tayyar ho jaiye Azad Hind ke naye season ke liye “Bhagat Singh Ki Kahani Tirange Ki Zubaani”, jahan hum lekar aa rahe hain ek aisi kahani jo sirf itihas nahi, ek jazba hai. Is season mein aap sunenge Bhagat Singh ke bachpan se lekar unke krantikari banne tak ka safar, unki soch, unka junoon, unka balidan, aur un palon ko, jinhone ek yuva ko legend bana diya. Aur in kahaniyon ko apni aawaaz se aur ...
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The Bollywood Radio

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मासिक+
 
फ़िल्मी दुनिया की दिलचस्प कहानियां, वो किस्से जो आपने अब तक नहीं सुने होंगे। तो देखिए सिनेमा, सुनिए किस्से। YouTube - @thebollywoodradio Facebook - The Bollywood Radio THE BOLLYWOOD RADIO सुनता है सारा इंडिया
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show series
 
रोटियाँ । एकता वर्मा रोटियों की स्मृतियों में आँच की कहानियाँ गमकती हैं। अम्मा बताती हैं, सेसौरी के ईंधन पर चिपचिपाई सी फूलती हैं रोटियाँ सौंफ़ला पर सिंकी रोटियाँ धुँवाई; पकती हैं चटक-चटक नीम के ईंधन पर कसैली सी, करुवाती हैं रोटियाँ पर, अरहर की जलावन पर पकती हैं भीतर-बाहर बराबर। अम्मा का मानना है, शहर रोटियों के स्वाद नहीं जानते स्टोव की रोटियों मे…
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हैप्पिली एवर आफ्टर । सत्यम तिवारी हम चाहते थे अंत में नायक ही विजयी हो लेकिन जो विजयी हुआ उन्होंने उसे ही नायक घोषित कर दिया अबकी बार भी सिनेमा में समय से अधिक, पैसों की बर्बादी खली वही हुआ फिर उन्होंने अपना नायक पहले से चुन रखा था कहानी जो चाहे रुख़ ले ऊँट किसी भी करवट बैठे राजगद्दी पर उनका ही नायक बैठेगा नायिका भी उसी के हिस्से आएगी दिलों में प्या…
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आज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँ । गोपालदास नीरज आज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँ कौन जाने यह दिया सुबह तक जले न जले? बम बारूद के इस दौर में मालूम नहीं ऐसी रंगीन हवा फिर कभी चले न चले। ज़िंदगी सिर्फ़ है ख़ुराक टैंक तोपों की और इंसान है एक कारतूस गोली का सभ्यता घूमती लाशों की इक नुमाइश है और है रंग नया ख़ून नई होली का। कौन जाने कि तेरी नर्गि…
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रोशनी, पानी, पेड़ | अतुलवीर अरोड़ा पानी में झाँकता है एक पूरा पेड़ एक पूरा पेड़ पानी हो जाता है झाँकते हुए पानी में दो पेड़ दीखते हैं एक पेड़ पानी का एक रोशनी का।द्वारा Nayi Dhara Radio
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सर्दी आई | सफ़दर हाश्मी सर्दी आई, सर्दी आई ठंड की पहने वर्दी आई। सबने लादे ढेर से कपड़े चाहे दुबले, चाहते तगड़े। नाक सभी की लाल हो गई सुकड़ी सबकी चाल हो गई। ठिठुर रहे हैं, काँप रहे हैं दौड़ रहे हैं, हाँप रहे हैं। धूप में दौड़ें तो भी सर्दी छाओं में बैठें तो भी सर्दी। बिस्तर के अंदर भी सर्दी बिस्तर के बाहर भी सर्दी। बाहर सर्दी, घर में सर्दी। पैर में सर्दी…
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अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं। विनोद कुमार शुक्ल अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं और पूरा आकाश देख लेते हैं सबके हिस्से का आकाश पूरा आकाश है। अपने हिस्से का चंद्रमा देखते हैं और पूरा चंद्रमा देख लेते हैं सबके हिस्से का चंद्रमा वही पूरा चंद्रमा है। अपने हिस्से की जैसी-तैसी साँस सब पाते हैं वह जो घर के बग़ीचे में बैठा हुआ अख़बार पढ़ रहा है और …
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आओ प्रेम दीप एक अज्ञात जलाओ - निर्मला पुतुल आओ मन के सूने आँगन आओ प्रेम पूरित भाव अनोखा एक मन हर दीप जलाओ घर पूरा रौशन हो जावे जो दूर भगावे अंधियारे आओ भी ओलती आँगन ताखा भनसा गोहाल गलियारा वो तुलसी चौराहा सर्वत्र आस के सपने सजाओ बरसों से बेजान हुई बस्ती की वो बुधनी काकी उसकी देहरी कुटिया आओ और अन्तरंग उसकी उम्मीद बनो कोई एक दीप दिखाओ काल कोठरी कब त…
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तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा। दुष्यंत कुमार तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा, अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा। ख़रगोश बन के दौड़ रहे हैं तमाम ख़्वाब, फिरता है चाँदनी में कोई सच डरा-डरा। पौधे झुलस गए हैं मगर एक बात है, मेरी नज़र में अब भी चमन है हरा-भरा। लंबी सुरंग-सी है तेरी ज़िंदगी तो बोल, मैं जिस जगह खड़ा हूँ वहाँ है कोई सिरा। माथे पे रखके…
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मुझ से पहले। अहमद फ़राज़ मुझ से पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस ने शायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा हो एक बे-नाम सी उम्मीद पे अब भी शायद अपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रक्खा हो जज़ीरा: द्वीप मैं ने माना कि वो बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा: जो प्रेम का वादा करके भूल गया हो खो चुका है जो किसी और की रानाई में शायद अब लौट के आए न तिरी…
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चाय के प्याले में । राजकमल चौधरी दुख करने का असली कारण है : पैसा - पहले से कम चीज़ें ख़रीदता है। कश्मीरी सेब दिल के मरीज़ को चाहिए तो क्या हुआ? परिश्रम अब पहले से कम पैसे ख़रीदता है। हम सबके लिए काम इतना ही बचा है कि सुबह वक़्त पर शेव कर सकें। शाम को घर में चाय, और पड़ोसिनों के बारे में घरेलू कहानियाँ, हज़ार छोटे दंगे-फ़साद होते हैं, इतिहास और आर्थिक…
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नुक्ता-चीं है। मिर्ज़ा ग़ालिब नुक्ता-चीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाए न बने क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने मैं बुलाता तो हूँ उस को मगर ऐ जज़्बा-ए-दिल उस पे बन जाए कुछ ऐसी कि बिन आए न बने खेल समझा है कहीं छोड़ न दे भूल न जाए काश यूँ भी हो कि बिन मेरे सताए न बने ग़ैर फिरता है लिए यूँ तिरे ख़त को कि अगर कोई पूछे कि ये क्या है तो छुपाए न बने इस नज़ाकत का ब…
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आगंतुक। अज्ञेय आँखों ने देखा पर वाणी ने बखाना नहीं। भावना ने छुआ पर मन ने पहचाना नहीं। राह मैंने बहुत दिन देखी, तुम उस पर से आए भी, गए भी, - कदाचित्, कई बार - पर हुआ घर आना नहीं।द्वारा Nayi Dhara Radio
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हार न अपनी मानूँगा मैं !। गोपालदास "नीरज" चाहे पथ में शूल बिछाओ चाहे ज्वालामुखी बसाओ, किन्तु मुझे जब जाना ही है - तलवारों की धारों पर भी, हँस कर पैर बढ़ा लूँगा मैं ! मन में मरू-सी प्यास जगाओ, रस की बूँद नहीं बरसाओ, किन्तु मुझे जब जीना ही है - मसल-मसल कर उर के छाले, अपनी प्यास बुझा लूँगा मैं ! हार न अपनी मानूंगा मैं ! चाहे चिर गायन सो जाए, और ह्रदय …
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तुम्हारी आँखें।पराग पावन कितनी सुंदर हैं तुम्हारी आँखें मुझे कुछ और चाहिए जो कहा न गया हो आँखों के बारे में इतनी सुंदर आँखों से कितनी सुंदर दुनिया दिखती होगी और तुम्हारा काजल ओह जैसे पानी पर पानी बरसता है अपनी ही उछाल को उत्सव में बदलते हुएद्वारा Nayi Dhara Radio
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चीख़ो दोस्त - प्रतिभा कटियार चीख़ो दोस्त कि इन हालात में अब चुप रहना गुनाह है और चुप भी रहो दोस्त कि लड़ने के वक़्त में महज़ बात करना गुनाह है फट जाने दो गले की नसें अपनी चीख़ से कि जीने की आख़िरी उम्मीद भी जब उधड़ रही हो तब गले की इन नसों का साबुत बच जाना गुनाह है चलो दोस्त कि सफ़र लंबा है बहुत ठहरना गुनाह है लेकिन कहीं न जाते हों जो रास्ते उन रास…
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अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!। हरिवंशराय बच्चन अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ! वृक्ष हों भलें खड़े, हों घने, हों बड़ें, एक पत्र-छाँह भी माँग मत, माँग मत, माँग मत! अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! तू न थकेगा कभी! तू न थमेगा कभी! तू न मुड़ेगा कभी!—कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! यह महान दृश्य है— चल रहा मनुष्य है अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, …
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जो शिलाएँ तोड़ते हैं । केदारनाथ अग्रवाल ज़िंदगी को वह गढ़ेंगे जो शिलाएँ तोड़ते हैं, जो भगीरथ नीर की निर्भय शिराएँ मोड़ते हैं। यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!! ज़िंदगी को वे गढ़ेंगे जो खदानें खोदते हैं, लौह के सोए असुर को कर्म-रथ में जोतते हैं। यज्ञ को इस शक्ति श्रम के श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!! ज़िंदगी को वे गढ़ेंगे जो प्रभंजन हा…
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एक बिजूके की प्रेम कहानी | अनामिका मैं हूँ बिजूका एक ऐसे खेत का जिसमें सालों से कुछ नहीं उगा बेकार पड़ा पड़ा धसक गया है मेरा हाड़ी सा गोल गोल माथा, उखड़ गई हैं मूँछें लचक गए हैं कंधे एक तरफ़ झूल गया है कुर्ता कुर्ते की जेबी में चुटुर- पुटुर करती है लेकिन नीले पीले पंखों वाली इक छोटी-सी चिड़िया एक वक़्त था जब यह चिड़िया मुझ से बहुत डरती थी धीरे-धीरे …
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चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती । त्रिलोचन चंपा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है खड़ी-खड़ी चुपचाप सुना करती है उसे बड़ा अचरज होता है : इन काले चिन्हों से कैसे ये सब स्वर निकला करते हैं चंपा सुंदर की लड़की है सुंदर ग्वाला है : गायें-भैंसे रखता है चंपा चौपायों को लेकर चरवाही करने जाती है चंपा अच्छी है चंचल है न ट ख ट …
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दिल में हर दम चुभने वाला । माधव कौशिक दिल में हर दम चुभने वाला काँटा सही सलामत दे आँखें दे या मत दे लेकिन सपना सही सलामत दे हमें तो युद्ध आतंक भूख से मारी धरती बख़्शी है आने वाली पीढ़ी को तो दुनिया सही सलामत दे दावा है मैं इक दिन उस को दरिया कर के छोड़ूँगा खुली हथेली पर आँसू का क़तरा सही सलामत दे बच्चे भी अब खेल रहे हैं ख़तरनाक हथियारों से बचपन की …
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इतनी सी आज़ादी । रूपम मिश्र चाहती हूँ जब घर-दुवार के सब कामों से छूटूँ तो हर साँझ तुम्हें फोन करूँ तुमसे बातें करूँ देश - दुनिया की सेवार- जवार बदलने और न बदलने की पेड़ पौधों के नाम से जानी जाती जगहों की तुमसे ही शोक कर लेती उस दुःख का कि पाट दिए गये गाँव के सभी कुवें ,गड़हे साथी और ढेरवातर पर अब कोई ढेरा का पेड़ नहीं है अब तो चीन्ह में भी नहीं बची बसऊ…
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अपना अभिनय इतना अच्छा करता हूँ । नवीन सागर घर से बाहर निकला फिर अपने बाहर निकल कर अपने पीछे-पीछे चलने लगा पीछे मैं इतने फ़ासले पर छूटता रहा कि ओझल होने से पहले दिख जाता था एक दिन घर लौटने के रास्ते में ओझल हो गया ओझल के पीछे कहाँ जाता घर लौट आया दीवारें धुँधली पड़ कर झुक-सी गईं सीढ़ियाँ नीचे से ऊपर ऊपर से नीचे होने लगीं पर वह घर नहीं लौटा घर से बाह…
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कोना । प्रिया जोहरी 'मुक्तिप्रिया’ वो कोना था मेरे जीवन का, एक गहरा, सकरा, फिर भी विस्तृत- इतना कि उसमें पूरा जीवन समा जाए। समा जाएँ मेरी हर तकलीफ, हर रंज, हर तंज। उस कोने में बैठकर लिख सकती हूँ अनगिनत प्रेम-पत्र, पढ़ सकती हूँ मन की दो किताबें, तोड़ सकती हूँ कई गुलाब, और गूँथ सकती हूँ एक फूलों की माला। महसूस कर सकती हूँ नदी का तेज, ताज़ी हवा का हर …
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ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं। जौन एलिया ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं शुक्रिया मश्वरत का चलते हैं हो रहा हूँ मैं किस तरह बरबाद देखने वाले हाथ मलते हैं है वो जान अब हर एक महफ़िल की हम भी अब घर से कम निकलते हैं क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में जो भी ख़ुश है हम उस से जलते हैं है उसे दूर का सफ़र दर-पेश हम सँभाले नहीं सँभलते हैं तुम बनो रंग तुम बनो ख़ुश्बू ह…
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लोग पगडंडियाँ बनाएँगें। लक्ष्मीशंकर वाजपेयी रास्ते जब नज़र न आएँगे लोग पगडंडियाँ बनाएँगे। खुश न हो कर्ज़ के उजालों से ये अँधेरे भी साथ लाएँगे। ख़ौफ़ सारे ग्रहों पे है कि वहाँ आदमी बस्तियाँ बसाएँगे। सुनते-सुनते गुज़र गई सदियाँ मुल्क़ से अब अँधेरे जाएँगे। जीत डालेंगे सारी दुनिया को वे जो अपने को जीत पाएँगे। दूध बेशक पिलाएँ साँपों को उनसे लेकिन ज़हर ह…
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जीवन की जय। मैथिलीशरण गुप्त मृषा मृत्यु का भय है, जीवन की ही जय है। जीवन ही जड़ जमा रहा है, निज नव वैभव कमा रहा है, पिता-पुत्र में समा रहा है, यह आत्मा अक्षय है, जीवन की ही जय है! नया जन्म ही जग पाता है, मरण मूढ़-सा रह जाता है, एक बीज सौ उपजाता है, स्रष्टा बड़ा सदय है, जीवन की ही जय है। जीवन पर सौ बार मरूँ मैं, क्या इस धन को गाड़ धरूँ मैं, यदि न उच…
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प्रायश्चित । हेमंत देवलेकर इस दुनिया में आने-जाने के लिए अगर एक ही रास्ता होता और नज़र चुराकर बच निकलने के हज़ार रास्ते हम निकाल नहीं पाते तो वही एकमात्र रास्ता हमारा प्रायश्चित होता और ज़िन्दगी में लौटने का नैतिक साहस भीद्वारा Nayi Dhara Radio
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वरदान माँगूँगा नहीं। शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ यह हार एक विराम है जीवन महासंग्राम है तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं । वरदान माँगूँगा नहीं ।। स्‍मृति सुखद प्रहरों के लिए अपने खण्डहरों के लिए यह जान लो मैं विश्‍व की सम्पत्ति चाहूँगा नहीं । वरदान माँगूँगा नहीं ।। क्‍या हार में क्‍या जीत में किंचित नहीं भयभीत मैं संघर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही …
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आओ, जल-भरे बरतन में । रघुवीर सहाय आओ, जल-भरे बरतन में झाँकें साँस से पानी में डोल उठेंगी दोनों छायाएँ चौंककर हम अलग-अलग हो जाएँगे जैसे अब, तब भी न मिलाएँगे आँखें, आओ पैठी हुई शीतल जल में छाया साथ-साथ भीगे झुके हुए ऊपर दिल की धड़कन-सी काँपे करती हुई इंगित कभी हाँ के, कभी ना के आओ जल-भरे बरतन में झाँके…
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औरत को चाहिए थी महज़ एक जेब। अदीबा ख़ानम औरत को चाहिए थी महज़ एक जेब उसमें चन्द खनकते सिक्के जिनके के बल पर आज़ाद करने थे कुछ ऐसे पंछी जो पीढ़ी दर पीढ़ी किसी महान षडयंत्र के तहत होते आए थे क़ैद चाभियाँ पल्लू में बाँध नहीं भाता उन्हें रानियों का स्वाँग उन चाभियों ने बन्द कर रखे हैं कई क़ीमती संदूक जिनमें बन्द हैं ख़ुद रानियाँ ही धूल फाँक रहीं गहनों की कि…
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अँधेरे के दिन । लक्ष्मीशंकर वाजपेयी बदल गए हैं अँधेरों के दिन अब वे नहीं निकलते सहमे, ठिठके, चुपके-चुपके रात के वक्त वे दिन-दहाड़े घूमते हैं बस्ती में सीना ताने, कहकहे लगाते नहीं डरते उजालों से बल्कि उजाले ही सहम जाते हैं इनसे अकसर वे धमकाते भी हैं उजालों को बदल गए हैं अँधेरों के दिन।द्वारा Nayi Dhara Radio
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कोई उम्मीद बर नहीं आती। मिर्ज़ा ग़ालिब कोई उम्मीद बर नहीं आती कोई सूरत नज़र नहीं आती मौत का एक दिन मुअ'य्यन है नींद क्यूँ रात भर नहीं आती आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी अब किसी बात पर नहीं आती जानता हूँ सवाब-ए-ताअत-ओ-ज़ोहद पर तबीअत इधर नहीं आती है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ वर्ना क्या बात कर नहीं आती क्यूँ न चीख़ूँ कि याद करते हैं मेरी आवाज़ गर नहीं आती…
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इत्यादि - राजेश जोशी कुछ लोगों के नामो का उल्लेख किया गया था जिनके ओहदे थे बाकी सब इत्यादि थे इत्यादि तादात में हमेशा ही ज़्यादा होते थे इत्यादि भाव ताव कर के सब्जी खरीदते थे और खाना वाना खा कर ख़ास लोगों के भाषण सुनने जाते थे इत्यादि हर गोष्ठी में उपस्थिति बढ़ाते थे इत्यादि जुलूस में जाते थे तख्तियां उठाते थे नारे लगाते थे इत्यादि लम्बी लाइनों में लग…
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बात की बात । शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ इस जीवन में बैठे ठाले ऐसे भी क्षण आ जाते हैं जब हम अपने से ही अपनी बीती कहने लग जाते हैं। तन खोया-खोया-सा लगता मन उर्वर-सा हो जाता है कुछ खोया-सा मिल जाता है कुछ मिला हुआ खो जाता है। लगता; सुख-दुख की स्मृतियों के कुछ बिखरे तार बुना डालूँ यों ही सूने में अंतर के कुछ भाव-अभाव सुना डालूँ कवि की अपनी सीमाऍं है कहता जितन…
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भुखमरी की ज़द में है या दार के साये में है। अदम गोंडवी भुखमरी की ज़द में है या दार के साये में है अहले हिंदुस्तान अब तलवार के साये में है छा गई है ज़ेहन की पर्तों पे मायूसी की धूप आदमी गिरती हुई दीवार के साये में है बेबसी का इक समंदर दूर तक फैला हुआ और कश्ती काग़ज़ी पतवार के साये में है हम फ़क़ीरों की न पूछो मुतमइन वो भी नहीं जो तुम्हारी गेसुए-ख़मदार के सा…
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विष्णु नागर । सबसे अच्छी कविता सबसे अच्छी कविता इतनी विनम्र होगी कि अविश्वसनीय लगेगी इतनी प्राकृतिक होगी कि हिन्दी लगेगी इतने दुखों में काम आएगी कि लिखी हुई नहीं लगेगी सबसे अच्छी कविता सबसे बुरे दिनों में याद आएगी उसे जो कंठ गाएगा मीठा लगेगा सबसे अच्छी कविता विकल कर देगी मुक्ति के लिए सबसे अच्छी कविता सबसे अच्छी बंदूक़ का सबसे बुरा झगड़ा साबित होगी…
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मैं फूल । गोपालदास "नीरज" निर्जन की नीरव डाली का मैं फूल ! कल अधरों में मुस्कान लिए आया था, मन में अगणित अरमान लिए आया था, पर आज झर गया खिलने से पहले ही, साथी हैं बस तन से लिपटे दो शूल ! निर्जन की नीरव डाली का मैं फूल !द्वारा Nayi Dhara Radio
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तन्हाई । शहरयार अँधेरी रात की इस रहगुज़र पर हमारे साथ कोई और भी था उफ़ुक़* (क्षितिज) की सम्त* (दिशा) वो भी तक रहा था उसे भी कुछ दिखाई दे रहा था उसे भी कुछ सुनाई दे रहा था मगर ये रात ढलने पर हुआ क्या हमारे साथ अब कोई नहीं हैद्वारा Nayi Dhara Radio
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शब्द और अर्थ के बीच। गायत्रीबाला पंडा शब्द और अर्थ के बीच एक नारी ही बदल जाती है लंबे इंतज़ार में। ख़ुद को कोड़ती है बीज बोती है अनाज उपजाती है धरती को सदाबहार बनाती है और जीवनभर किसी न किसी की छाया में बैठकर एक इंसान बनने की अथक प्रतीक्षा करती है।द्वारा Nayi Dhara Radio
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आँखें देखकर । गोरख पांडेय ये आँखें हैं तुम्हारी तकलीफ़ का उमड़ता हुआ समुंदर इस दुनिया को जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए।द्वारा Nayi Dhara Radio
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विद्रोह करो, विद्रोह करो। शिवमंगल सिंह 'सुमन' आओ वीरोचित कर्म करो मानव हो कुछ तो शर्म करो यों कब तक सहते जाओगे, इस परवशता के जीवन से विद्रोह करो, विद्रोह करो। जिसने निज स्वार्थ सदा साधा जिसने सीमाओं में बाँधा आओ उससे, उसकी निर्मित जगती के अणु-अणु कण-कण से विद्रोह करो, विद्रोह करो। मनमानी सहना हमें नहीं पशु बनकर रहना हमें नहीं विधि के मत्थे पर भाग्य…
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मुझे अब डर नहीं लगता | मोहसिन नक़वी किसी के दूर जाने से तअ'ल्लुक़ टूट जाने से किसी के मान जाने से किसी के रूठ जाने से मुझे अब डर नहीं लगता किसी को आज़माने से किसी के आज़माने से किसी को याद रखने से किसी को भूल जाने से मुझे अब डर नहीं लगता किसी को छोड़ देने से किसी के छोड़ जाने से ना शम्अ' को जलाने से ना शम्अ' को बुझाने से मुझे अब डर नहीं लगता अकेले म…
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पुराना घर। गोबिंद प्रसाद पुराना घर इतना पुराना कि कभी पुराना नहीं होता कविता की उस किताब की तरह पंक्तियों के बीच ठहरे हुए किसी अनबीते की तरह मन में बसा रहता है यह पुराना घर पुराना घर आज भी कितना नया है इन आँखों में और आँखें ख़ुद कितनी नई हैं घर के इस पुरानेपन को देखने के लिए इसे कौन जानता है सिवा पुराने घर के...।…
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दुख | प्रियाँक्षी मोहन पिताओं के दुख माँओं के दुखों से मुख़्तलिफ़ होते हैं। वे कभी भी प्रत्यक्ष रूप से नहीं दिखते वे चूहों से झाँकते हैं अधजली सिगरेटों से खूटियों पर टंगी हुई थकी कमीज़ों से, पुरानी ऐनकों से, और बिजली व जल विभाग के निरंतर बह रहे बिलों सेद्वारा Nayi Dhara Radio
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फूले कदंब । नागार्जुन फूले कदंब टहनी-टहनी में कंदुक सम झूले कदंब फूले कदंब। सावन बीता बादल का कोप नहीं रीता जाने कब से तू बरस रहा ललचाई आँखों से नाहक जाने कब से तू तरस रहा मन कहता है,छू ले कदंब फूले कदंब फूले कदंब।द्वारा Nayi Dhara Radio
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नफ़ी | किश्वर नाहीद मैं थी आईना फ़रोश* (विक्रेता) कोह-ए-उम्मीद* (आशा का पहाड़) के दामन में अकेली थी ज़ियाँ* (नुक़्सान) कोशिश सुरय्या की थी हम-दोश मुझे हर रोज़ हमा-वक़्त* (हर समय) थी बस अपनी ख़बर मैं थी ख़ुद अपने में मदहोश मैं वो तन्हा थी जिसे पैर मिलाने का सलीक़ा भी न था मैं वो ख़ुद-बीं* (आत्म-मुग्ध) थी जिसे अपने हर इक रुख़ से मोहब्बत थी बहुत मैं वो…
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माँ । श्रीनरेश मेहता मैं नहीं जानता क्योंकि नहीं देखा है कभी— पर, जो भी जहाँ भी लीपता होता है गोबर के घर-आँगन, जो भी जहाँ भी प्रतिदिन दुआरे बनाता होता है आटे-कुंकुम से अल्पना, जो भी जहाँ भी लोहे की कड़ाही में छौंकता होता है मेथी की भाजी, जो भी जहाँ भी चिंता भरी आँखें लिए निहारता होता है दूर तक का पथ - वही, हाँ, वही है माँ!!…
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रात यूँ दिल में तिरी खोई हुई याद आई | फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ रात यूँ दिल में तिरी खोई हुई याद आई जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए जैसे सहराओं में हौले से चले बाद-ए-नसीम जैसे बीमार को बे-वज्ह क़रार आ जाएद्वारा Nayi Dhara Radio
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नृत्य और परिकथाएँ | अन्वेषा राय 'मंदाकिनी' मेरे पाँव, बचपन से थिरकते रहे, किसी अनजान सवालिया धुन पर... मैं बढ़ती रही.. नाचती रही.. मेरे जीवन का उद्देश्य यह खोज भर रहा कि मेरे इस जीवन संगीत का उद्गम कहाँ है ?? मेरा यह कारवाँ जारी रहा... हर रोज़ मेरे पग उस संगीत की खोज में नृत्य करते चले गए !! मैं शायद नहीं जानती हूँ कि जीवन के किस रोज़ मेरा परी-कथाओ…
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मैं और मैं! | साक़ी फ़ारुक़ी मैं हूँ मैं वो जिस की आँखों में जीते जागते दर्द हैं दर्द कि जिन की हम-राही में दिल रौशन है दिल जिस से मैं ने इक दिन इक अहद (प्रतिज्ञा) किया था अहद कि दोनों एक ही आग में जलते रहेंगे आग कि जिस में जल कर जिस्म हुआ ख़ाकिस्तर (राख) जिस्म कि जिस के कच्चे ज़ख़्म बहुत दुखते थे ज़ख़्म कि जिन का मरहम वक़्त के पास नहीं है वक़्त कि जि…
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