show episodes
 
"हमेशा याद रखें, जो भी मैं आपसे कहता हूं, आप इसे दो तरीकों से ले सकते हैं। आप इसे बस मेरे अधिकार पर ले जा सकते हैं, 'क्योंकि ओशो ऐसा कहते हैं, यह सच होना चाहिए' - तब आप पीड़ित होंगे, तब आप नहीं बढ़ेंगे। "मैं जो भी कहता हूं, उसे सुनो, इसे समझने की कोशिश करो, इसे अपने जीवन में लागू करो, देखो कि यह कैसे काम करता है, और फिर अपने निष्कर्ष पर आओ। वे वही हो सकते हैं, वे नहीं भी हो सकते हैं। वे कभी भी समान नहीं हो सकते क्योंकि आपके पास एक अलग व्यक्तित्व है, एक अद्वितीय व्यक्ति है। ” Visit: https://l ...
 
?ᴊᴀɪ ʙᴀᴊʀᴀɴɢʙᴀʟɪ????ᴏғғɪᴄɪᴀʟ ᴀᴄᴄᴏᴜɴᴛ @rvstiger?ғᴏʟʟᴏᴡ ᴜs ᴀɴᴅ ɢᴇᴛ ᴜᴘᴅᴀᴛᴇs?ɪ ᴀᴍ ᴀᴠᴀɪʟᴀʙʟᴇ ᴏɴ ᴇᴠᴇʀʏ sᴏᴄɪᴀʟ ᴍᴇᴅɪᴀ ᴘʟᴀᴛғᴏʀᴍs#rvsbayana #bayana05team
 
हिन्दी भक्ति गीत, भजन, कीर्तन, आरती, चालीसा - शब्द एवं गान : bhajans.ramparivar.com Hindi Bhakti Geet, Bhajan, Kirtan, Arati and Chalisa with MP3 audio and youtube video (written/composed/sung by and favorites of Shri Ram Parivar - our family and friends)
 
An Alternative | Experimental Rock Band hailing from Himachal Pradesh, India. The band Soul Portrait made its way initially with three of it's members Hitesh, Bhavtosh and Ashwani in the Autumn of 2012. After quite a few months the band felt the need of expanding it's line up which led to the addition of Anirudh, Khushal and Karan to the existing line up. The band primarily focuses on hunting for the most pleasing melodies and sounds. Technicalities have never been the priority of the band, ...
 
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show series
 
जैसे नद्दी एक है, बहुतेरे हैं घाट।। बहुतेरे हैं घाट, भेद भक्तन में नाना। जो जेहि संगत परा, ताहि के हाथ बिकाना।। चाहे जैसी करै भक्ति, सब नामहिं केरी। जाकी जैसी बूझ, मारग सो तैसी हेरी।। फेर खाय इक गये, एक ठौ गये सिताबी। आखिर पहुंचे राह, दिना दस भई खराबी।। पलटू एकै टेक ना, जेतिक भेस तै बाट। जैसे नद्दी एक है, बहुतेरे हैं घाट।। 19।। लेहु परोसिनि झोंपड़ा,…
 
मन मिहीन कर लीजिए, जब पिउ लागै हाथ।। जब पिउ लागै हाथ, नीच ह्वै सब से रहना। पच्छापच्छी त्याग उंच बानी नहिं कहना।। मान-बड़ाई खोय खाक में जीते मिलना। गारी कोउ दै जाय छिमा करि चुपके रहना।। सबकी करै तारीफ, आपको छोटा जानै। पहिले हाथ उठाय सीस पर सबकी आनै।। पलटू सोइ सुहागनी, हीरा झलकै माथ। मन मिहीन कर लीजिए, जब पिउ लागै हाथ।। 16।। पानी काको देइ प्यास से मुव…
 
सोई सती सराहिये, जरै पिया के साथ।। जरै पिया के साथ, सोई है नारि सयानी। रहै चरन चित लाय, एक से और न जानी।। जगत करै उपहास, पिया का संग न छोड़ै। प्रेम की सेज बिछाय, मेहर की चादर ओढ़ै। ऐसी रहनी रहै, तजै जो भोग-विलासा। मारै भूख-पियास याद संग चलती स्वासा।। रैन-दिवस बेहोस, पिया के रंग में राती। तन की सुधि है नाहिं, पिया संग बोलत जाती।। पलटू गुरु परसाद से कि…
 
सीस उतारै हाथ से, सहज आसिकी नाहिं।। सहज आसिकी नाहिं, खांड खाने को नाहीं। झूठ आसिकी करै, मुलुक में जूती खाहीं।। जीते जी मरि जाय, करै ना तन की आसा। आसिक का दिन-रात, रहै सूली उपर बासा।। मान बड़ाई खोय, नींद भर नाहीं सोना। तिलभर रक्त न मांस, नहीं आसिक को रोना।। पलटू बड़े बेकूफ वे, आसिक होने जाहिं। सीस उतारै हाथ से, सहज आसिकी नाहिं।। 10।। यह तो घर है प्रेम…
 
क्या सोवै तू बावरी, चाला जात बसंत।। चाला जात बसंत, कंत ना घर में आये। धृग जीवन है तोर, कंत बिन दिवस गंवाये।। गर्व गुमानी नारि फिरै जोवन की माती। खसम रहा है रूठि, नहीं तू पठवै पाती।। लगै न तेरो चित्त, कंत को नाहिं मनावै।। कापर करै सिंगार, फूल की सेज बिछावै।। पलटू ऋतु भरि खेलि ले, फिर पछतावै अंत। क्या सोवै तू बावरी, चाला जात बसंत।। 7।। ज्यौं-ज्यौं सू…
 
दीपक बारा नाम का, महल भया उजियार।। महल भया उजियार, नाम का तेज विराजा। सब्द किया परकास, मानसर ऊपर छाजा।। दसों दिसा भई सुद्ध, बुद्ध भई निर्मल साची। छूटी कुमति की गांठ, सुमति परगट होय नाची।। होत छतीसो राग, दाग तिर्गुन का छूटा। पूरन प्रगटे भाग, करम का कलसा फूटा।। पलटू अंधियारी मिटी, बाती दीन्ही बार। दीपक बारा नाम का, महल भया उजियार। 4।। हाथ जोरि आगे मि…
 
नाव मिली केवट नहीं, कैसे उतरै पार।। कैसे उतरै पार पथिक विश्वास न आवै। लगै नहीं वैराग यार कैसे कै पावै।। मन में धरै न ग्यान, नहीं सतसंगति रहनी। बात करै नहिं कान, प्रीति बिन जैसी कहनी।। छूटि डगमगी नाहिं, संत को वचन न मानै। मूरख तजै विवेक, चतुराई अपनी आनै।। पलटू सतगुरु सब्द का तनिक न करै विचार। नाव मिली केवट नहीं, कैसे उतरै पार।। 1।। साहिब वही फकीर है…
 
क्व गतं केन वा नीतं कुत्र लीनमिदं जगत्। अधुनैव मया दृष्टं नास्ति किं महद˜ुतम।। 66।। किं हेयं किमुपादेयं किमन्यत् किं विलक्षणम्। अखण्डानन्दपीयूषपूर्णब्रह्ममहार्णवे।। 67।। न किंचिदत्र पश्यामि नशृणोमि न वेदम्यहम्। स्वात्मनैव सदानन्दरूपेणास्मि स्वलक्षणः।। 68।। असंगोऽहमनंगोऽहमलिंगोऽहमहं हरिः। प्रशान्तोऽहमनन्तोऽहं परिपूर्णश्चिरन्तनः।। 69।। अकर्ताऽहमभोक्त…
 
समाधातुं वाह्यादृष्ट्या प्रारब्धं वदति श्रुतिः। न तु देहादिसत्यत्व बोधनाय विपश्चिताम्।। 60।। परिपूर्णमनाद्यन्तमप्रमेयमविक्रियम्। सद्घनं चिद्घनं नित्यमानन्दघनमव्यम्।। 61।। प्रत्यगेकरसं पूर्णमनन्त सर्वतोमुखम्। अहेयमुनपादेयमनधेयमनाश्रयम्।। 62।। निर्गुण निष्क्रियं सूक्ष्मं निर्विकल्पं निरंजनम्। अनिरूप्यस्वरूपं यन्मनोवाचामगोचरम्।। 63।। सत्समृद्धं स्वतः …
 
प्रारब्धं सिध्यति तदा यदा देहात्मना स्थिति। देहात्मभावो नैवेष्टः प्रारब्धं त्यज्यतामतः।। 56।। प्रारब्धकल्पनाऽप्यस्य देहस्य भ्रांति रेष हि।। 57।। अध्यस्तस्य कुतस्य असत्यस्य कुतोजनिः। अजातस्य कुतो नाशः प्रारब्धमसतः कुतः।। 58।। ज्ञानेनाज्ञानकार्यस्य समूलस्य लयो यदि। तिष्ठत्ययं कथं देह इति शड्कावतो जडान्।। 59।।…
 
स्वमसंगमुदासीनं परिज्ञाय नत्रो यथा। न श्लिष्यते यतिः किंचित् कदाचि˜ाविकर्मभिः।। 51।। न नभो घटोयोगेन सुरागन्धेन लिप्यते। तथाऽऽत्मोपाधियोगेन तद्धर्मैनेव लिप्यते।। 52।। ज्ञानोदयात् पुराऽऽरब्धं कर्म ज्ञानान्न नश्यति। यदत्वा स्वफलं लक्ष्यमुद्दिश्योत्सृष्टवाणवत्।। 53।। व्याघ्रबुद्ध्या विनिर्मुक्तो वाणः पश्चातु गोमतौ। न तिष्ठति भिनत्येव लक्ष्यं वेगेन निर्…
 
न प्रत्यग्ब्रह्मणोभेदं कथाऽपि ब्रह्मसर्गयोः। प्रज्ञया यो विजानाति स जीवन्मुक्त इष्यते।। 46।। साधुभिः पूज्यमानेऽस्मिन् पीड्यमानेऽपि दुर्जनैः। समभावो भवेद्यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते।। 47।। विज्ञातब्रह्मतत्वस्य यथापूर्व न संसृतिः। अस्ति चेन्न स विज्ञातब्रह्मभावो बहिर्मुखः।। 48।। सुखाद्यनुभवो यावत् तावत् प्रारब्धमिष्यते। फलोदयः क्रियापूर्वो निष्क्रियो न …
 
वासनाऽनुदयो भोग्ये वैराग्यस्य तदाऽवधिः। अहंभावावोदयाभावो बोधस्य परमावधिः।। 41।। लीनवृत्तेरनुत्पत्तिर्मर्यादोपरतेस्तु सा। स्थितप्रज्ञो यतिरयं यः सदानन्दमश्नुते।। 42।। ब्रह्मण्येव विलीनात्मा निर्विकारो विनिष्क्रियः। ब्रह्मात्मनो शोधितयोरेकभावावगाहिनी।। 43।। निर्विकल्पा च चिन्मात्रा वृत्तिःप्रज्ञेति कथ्यते। सा सर्वदा भवेद्यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते।। 44…
 
वृत्तयस्तु तदानीमप्यज्ञाता आत्मगोचरा:। स्मरणादनुमीयन्ते व्युत्थितस्य समुत्थिता:।। 36।। अनादाविह संसारे संचिता: कर्मकोटयः। अनेन विलयं यान्ति शुद्धो धर्मोऽभिवर्धते।। 37।। धर्ममेधमिमं प्राहुः समाधि योगवित्तमा:। वर्षत्येष यथा धर्मामृतधारा: सहस्रश:।। 38।। अमुना वासनाजाले निःशेष प्रविलापिते। समूलोन्मूलिते पुण्यपापाख्ये कर्मसंचये।। 39।। वाक्यमप्रतिबद्धं स…
 
इत्थं वाक्यैस्तदर्थानुसंधानं श्रवणं भवेत। युक्ता सभावितत्वा संधानं मननं तु तत्।। 33।। ताभ्यां निर्विचिकित्सेऽर्थे चेतसः स्थापितस्य तत्। एकतानत्वमेतद्धि निदिध्यासनमुच्यते।। 34।। ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद्धयैयैकगोचरम्। निवातदीपवच्चितं समाधिरभिधीयते।। 35।।
 
मायोपाधिर्जगद्योनिः सर्वज्ञत्वादिलक्षण:। पारोक्ष्यशबलः सत्याद्यात्मकस्तत्पदाभिध:।। 30।। आलम्बतनया भाति योऽस्मत्प्रत्ययशब्दयो:। अंतःकरणसंभिन्नबोध: स त्वपदाभिध:।। 31।। मायाऽविद्ये विहायैव उपाधी परजीवयो:। अखंड सच्चिदानन्दं परं ब्रह्म विलक्ष्यते।। 32।।
 
चित्तमूलो विकल्पोऽयं चित्ताभावे न कश्चन। अतश्चित्तं समाधेहि प्रत्यग्रूपे परात्मनि।। 26।। अखंडानंदमात्मनं विज्ञाय स्वस्वरूपतः। बहिरंतः सदानंदरसास्वादनमात्मनि।। 27।। वैराग्यस्य फलं बोधो बोधस्योपरतिः फलम्। स्वानंदानुभवाच्छान्तिरेषैवोपरते: फलम्।। 28।। यद्युत्तरोत्तराभावे पूर्वपूर्वं तु निष्फलम्। निवृक्तिः परमा तृप्तिरानन्दोऽनुपमः स्वतः।। 29।।…
 
स्वात्मन्यारोपितशेषाभासवस्तुनिरासितः। स्वयमेव परब्रह्म पूर्णमद्वयमक्रियम्।। 21।। असत्कल्पो विकल्पो यं विश्वमित्येकवस्तुनि। निर्विकारे निराकरे निर्विशेषेर्भिदा कुतः।। 22।। द्रष्टा दर्शनदृश्यादिभावशून्ये निरामये। कल्यार्णव इवात्यन्तं परिपूर्णे चिदात्मनि।। 23।। तेजसीव तमो यत्र विलीनं भ्रांतिकारणम्। अद्वितीये परे तत्वे निर्विशेषेर्भिदा कुतः।। 24।। एकात…
 
जीवतो यस्य कैवल्यं विदेहोऽपि स केवलः। समाधिनिष्ठतामेत्य निर्विकल्पो भवानघ।। 16।। अज्ञानहृदयग्रन्थेर्निः शेषविलयस्तदा। समाधिनाऽविकल्पेन यदाऽद्वैतात्मदर्शनम्।। 17।। अत्रात्मत्वं दृढीकुर्वन्नहमादिषु संत्यजन्। उदासीनतया तेषु तिष्ठेद्घटपटादिवत्।। 18।। ब्रह्मादिस्तम्ब पर्यन्तं मृषामात्रा उपाधयः। ततः पूर्ण स्वात्मनं पश्येदेकात्मना स्थितम्।। 19।। स्वयं ब्र…
 
अहंकारग्रहान्मुक्तः स्वरूपमुपपद्यते। चंद्रवत्विमलः पूर्ण सदानन्दः स्वयंप्रभः।। 11।। क्रियानाशा˜वेच्चिन्तानाशो तस्माद्वासनाक्षयः। वासनाऽपक्षयोमोक्षः स जीवन्मुक्तिरिष्यते।। 12।। सर्वत्र सर्वतः सर्व ब्रह्ममात्रावलोकनम्। स˜ावभावनादाढ्र्याद्वासनालश्यमनुते।। 13।। प्रमादो ब्रह्मनिष्ठायां न कर्तव्यः कदाचन। प्रमादो मृत्युरित्याहुर्विद्यायां ब्रह्मवादिनः।। 1…
 
मातापित्रोर्मलो˜ूतं मलमांसमयं वपुः। त्यक्त्वा चण्डालवद्दूरं ब्रह्मभूयं कृती भव।। 6।। घटाकाशं महाकाशं इवात्मानम् परात्मनि। विलाप्याखंडभावेनं तूयणीं भव सदा मुने।। 7।। स्वप्रकाशमधिष्ठानं स्वयंभूय सदात्मना। ब्रह्मांडमपि पिंडांडं त्यज्यतां मलभांडवत्।। 8।। चिदात्मनि सदानन्दे देहरूढामहंधियम्। निवेश्य लिंगमुत्सृज्य केवलो भव सर्वदा।। 9।। यत्रैष जगदाभासो दर्…
 
ज्ञात्वा स्वयं प्रत्यगात्मनं बुद्धितद्वृत्तिसाक्षिणम्। सौऽहमित्येव तद्वृत्या स्वान्यत्रात्ममतिं व्यजेत्।। 2।। लोकानुवर्तनं त्यक्त्वा त्यक्त्वा देहानुवर्तनम्। शास्त्रानुवर्तनम् त्यक्त्वा स्वाध्यासापनयं करु।। 3।। स्वात्मन्येव सदा स्थित्या मनो नष्यति योगिनः। युक्त्या श्रुत्या स्वानुभूत्या ज्ञात्वा सावत्म्यिमात्मनः।। 4।। निद्राया लोकवार्तायाः शब्दादेरा…
 
अंतः शरीरे निहतो गुहायामज एको नित्यमस्य। पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमंतरे संचरन् यं पृथिवी न वेद। यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरे संचरन् यमापो न विदुः। यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरे संचरन् यं तेजो न वेद। यस्य वायुः शरीरं यो वायुमन्तरे संचरन् यं वायुर्न वेद। यस्याकाशः शरीरं य आकाशमन्तरे संचरन् यमाकाशो न वेद। यस्य मनः शरीरं यो मनोऽन्तरे संचरन् यं मनो न वेद। यस्…
 
शांति पाठ ओम्, शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्र्यमा। शं न इंद्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुक्रमः। नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वादिष्यामि। ऋत वादिष्यामि। सत्यं वादिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारम्। ओम् शांतिः शांतिः शांतिः। ओम्, हमारे लिए सूर्य देवता कल्याणकारी हों। वरुण …
 
'सराहा' और 'तिलोपा' पर प्रवचन , भारतीय रहस्यवादी जो अंततः तिब्बती बौद्ध धर्म के पूर्वज थे।
 
2500 वर्ष के बाद ओशो की वाणी ने महावीर के दर्शन को पुन: समसामयिक कर दिया है। अपनी अनूठी दृष्टि द्वारा ओशो ने महावीर की देशना का वैज्ञानिक प्रस्तुतिकरण किया है। महावीर द्वारा दिए गए साधना-सूत्रों को ओशो ने अपनी वाणी द्वारा सरल एवं जीवन-उपयोगी बना दिया है।
 
‘अगर कोई भी विचार पहुंचाना हो, लगता हो कि प्रीतिपूर्ण है, पहुंचाने जैसा है, तो उसके लिए बल इकट्ठा करना, संगठित होना, उसके लिए सहारा बनना एकदम जरूरी है। तो उसके लिए तो डिटेल्स में सोचें, विचार करें। लेकिन ये सारी बातें जो मुझे सुझाई हैं, ये सब ठीक हैं।
 
कौन सा ईश्र्वर झूठा ईश्वर है? मंदिरों में जो पूजा जाता है, वह ईश्र्वर झूठा है, वह इसलिए झूठा है कि उसका निर्माण मनुष्य ने किया है। मनुष्य ईश्र्वर को बनाए, इससे ज्यादा झूठी और कोई बात नहीं हो सकती है।
 
'मृत्यु, जिसे हम जीवन का अंत समझते हैं, उसी की चर्चा से प्रारंभ होता है यह कठोपनिषद। एक छोटे से बच्चे नचिकेता के निर्मल ‍‍हृदय की व्यथा जो क्रुद्ध पिता ‍के वचनों को स्वीकार करता है और अपने संकल्प के कारण मृत्यु से भी तीन वर अर्जित कर लेता है। एक प्रतीक के रूप में यह कथा प्रत्येक मनुष्य के सौभाग्य की कथा है जिसे ओशो ने अग्नि-विद्या के रूप में ‍हमें …
 
बुद्धपुरुष ओशो के ये प्रवचन कबीर जैसे बुद्धपुरुष की वाणी पर अधिकारपूर्वक दिए गए वचन हैं। अध्यात्म, धर्म, ध्यान, समाधि के रहस्यों को कबीर वाणी द्वारा ओशो ने एक नए परिप्रेक्ष्य में उदघाटित किया है। ओशो कहते हैं, ‘कबीर अनूठे हैं।’
 
अगर करूणा आ जाए तो क्रांति अनिवार्य है। क्रांति सिर्फ करूणा की परिधि, छाया से ज्यादा नहीं है। और जो क्रांति करूणा के बिना आयेगी, बहुत खतरनाक होगी। ऐसी बहुत क्रांतियां हो चुकी हैं और वे जिन बीमारियों को दूर करती हैं, उनसे बड़ी बीमारियों को अपने पीछे जाती हैं।
 
‘संत दरिया प्रेम की बात करेंगे। उन्होंने प्रेम से जाना। इसके पहले कि हम उनके वचनों में उतरें...अनूठे वचन हैं ये। और वचन हैं बिलकुल गैर-पढ़े लिखे आदमी के। दरिया को शब्द तो आता ही नहीं था; अति गरीब घर में पैदा हुए—धुनिया थे, मुसलमान थे। लेकिन बचपन से ही एक ही धुन थी कि कैसे प्रभु का रस बरसे, कैसे प्रार्थना पके। बहुत द्वार खटखटाए, न मालूम कितने मौलविय…
 
बाबा मलूकदास—यह नाम ही मेरा हृदय-वीणा को झंकृत कर जाता है। जैसे अचानक वसंत आ जाय! जैसे हजारों फूल अचानक झर जायं! नानक से मैं प्रभावित हूं; कबीर से चकित हूं; बाबा मलूकदास से मस्त। ऐसे शराब में डूबे हुए वचन किसी और दूसरे संत के नहीं हैं। नानक में धर्म का सारसूत्र है, पर रूखा-सूखा। कबीर में अधर्म को चैनौती है—बड़ी क्रांतिकारी, बड़ी विद्रोही। मलूक में …
 
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