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किताबें और लेखन सार्वजनिक
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सबसे अच्छा किताबें और लेखन पॉडकास्ट हम पा सकते हैं (अपडेट किया गया दिसंबर 2019)
सबसे अच्छा किताबें और लेखन पॉडकास्ट हम पा सकते हैं
अपडेट किया गया दिसंबर 2019
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show episodes
 
A
Anhad Kriti Ki Awazein
मासिक
 
अनहद कृति विशुद्ध रूप से साहित्यिक पूर्णतयः अव्यवसायिक, साहित्य, कला एवं सामाजिक सरोकारों की त्रैमासिक इ-पत्रिका है। दिल को छू लेने वाली साहित्यिक संरचना, भारतीय संस्कृति की मूलभूत अवधारणा में निहित समन्वय-सामंजस्य एवं मानवतावादी दृष्टि को उजागर करती, हमारी टेढ़ी राजनीति के सीधे सरल नाम से कुछ दूर हो कर, आशा से परिपूर्ण, लिखी गयी रचनाओं (कविता, कहानी, लेख, व्यंग्य) का इसमें सहज स्वागत है।
 
M
Masala Chai
साप्ताहिक+
 
इस खास सेगमेंट में कविता के माध्यम हम गंभीर बातों को आप तक पहुंचाते है.
 
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show series
 
सुनिए परसाई के रचना संग्रह निठल्ले की डायरी का एक अंश
 
प्रधानसेवक के झकाझक भाषणों से देश की सारी समस्याएं हल हो जाने वाली हैं और कुछ करने की ज़रुरत ही नहीं है लोग मस्त रहें पकोड़े छानें
 
आप चाहें तो प्रेम कर लीजिये, आप चाहें तो लव कर लीजिये प्रेम न भाषा देखता है न देशी-विदेशी देखता है, प्रेम सरहदें नहीं देखता, प्रेम धर्म नहीं देखता, प्रेम में सियासत घुसेड़ने वालों हम तप प्रेम करते रहेंगे तुम्हारी ऐसी की तैसी.
 
इब्ने इंशा की किताब 'उर्दू की आख़िरी किताब' के कुछ अंश
 
हरियाणा के सुप्रसिद्ध हास्य रचनाकार अरुण जैमिनी की मारक रचना सुनिये
 
कई बार कुछ बातों का मतलब सिर्फ़ उतना ही नहीं होता जितना कि फ़ौरी तौर पर दिख रहा होता है कई बार कुछ बातों के मानी बहुत विशाल होते हैं यही खासियत है जावेद साहब की कलम में.
 
सियासत के खेल से पर्दा उठती जावेद साहब की ये रचना सुनिए.
 
तुमने बहुत सहा है / तुमने जाना है किस तरह स्त्री का कलेजा पत्थर हो जाता है / किस तरह स्त्री पत्थर हो जाती है / महल अटारी में सजाने लायक / मैं एक हाड़ मांस की स्त्री नहीं हो पाउंगी पत्थर / न ही माल असबाब / तुम डोली सजा देना / उसमें काठ की एक पुतली रख देना / उसे चूनर भी ओढ़ा देना / और उनसे कहना लो ये रही तुम्हारी दुल्हन / मैं तो जोगी के साथ जाउंगी माँ…
 
साल 2017 ख़त्म हो रहा है लोग आंकलन करेंगे कि क्या पाया क्या खोया लेकिन इस आंकलन में हम अक्सर अच्छा अच्छा याद करते रह जाते हैं जो बुरा और ग़लत हुआ उससे सबक लेना भूल जाते हैं.
 
हिन्दू मुस्लिम के नाम पर लड़ना बन्द करो भाई...कहानी सुनो
 
सआदत हसन मंटो की कहानियों का एक ये भी रूप है
 
सुनिए हरिशंकर परसाई का व्यंग्य 'कन्धे श्रवण कुमार के'
 
अभी अभी चुनाव ख़त्म हुए हैं पता नहीं क्यूँ परसाई जी का ये व्यंग्य याद गया. हालांकि ये दुखद स्थिति है कि चुनाव सुन के दलाली शब्द याद आ जाए पर, ठीक है अब, क्या कर सकते हैं.
 
माँ का कोई रिप्लेसमेंट हो सकता है क्या...माँ की यादों से बिलग होने के लिए कोई औए याद ज़हन में जोड़ी जा सकती है क्या...कोई उपाय हो तो बताओ यार...आज कल माँ बहुत याद आती है.
 
"मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे / अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते / जब कोई तागा टूट गया या ख़तम हुआ/ फिर से बाँध के और सिरा कोई जोड़ के उसमें/ आगे बुनने लगते हो तेरे इस ताने में लेकिन / इक भी गाँठ गिरह बुनतर की / देख नहीं सकता है कोई / मैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्ता / लेकिन उसकी सारी गिरहें / साफ़ नज़र आती हैं मेरे यार जुलाहे"…
 
"सूखे मौसम में बारिशों को याद कर के रोतीं हैं / उम्र भर हथेलियों में तितलियां संजोतीं हैं / और जब एक दिन बूंदें सचमुच बरस जातीं हैं / हवाएँ सचमुच गुनगुनाती हैं / फ़जा़एं सचमुच खिलखिलातीं हैं / तो ये सूखे कपड़ों ,अचार ,पापड़ बच्चों और सब दुनिया को भीगने से बचाने को दौड़ जातीं हैं / खुशी के एक आश्वासन पर पूरा पूरा जीवन काट देतीं / अनगिनत खाइयों प ...…
 
अंज सुनिए धार्मिक कुरीतियों पर कटाक्ष करती विद्रोही की कविता "धर्म" धर्म की आज्ञा है कि लोग दबा रखें नाक / और महसूस करें कि भगवान गंदे में भी गमकता है / जिसने भी किया है संदेह लग जाता है उसके पीछे जयंत वाला बाण / और एक समझौते के तहत हर अदालत बंद कर लेती है दरवाजा / अदालतों के फैसले आदमी नहीं पुरानी पोथियां करती हैं / जिनमें दर्ज है पहले से ही ल ...…
 
"कुछ औरतों ने अपनी इच्छा से कूदकर जान दी थी/ ऐसा पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज है/ और कुछ औरतें अपनी इच्छा से चिता में जलकर मरी थीं/ ऐसा धर्म की किताबों में लिखा हुआ है/ मैं कवि हूँ, कर्त्ता हूँ क्या जल्दी है/ मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित दोनों को एक साथ/ औरतों की/ अदालत में तलब करूँगा/ और बीच की सारी अदालतों को मंसूख कर दूँगा/ मैं उन दावों को भी मं ...…
 
फूलो पांच बरस की थी तो क्या हुआ, उसे मालूम था कि पति के सामने लज्जा करनी चाहिए. परम्पराओं और मर्यादाओं को लादने थोपने के चक्कर में अक्सर हम क्या से क्या कर जाते हैं.
 
वो सोचता था भला हुआ जो एक नई सोच की विजय नहीं हुई वरना इन क्रांतिकारियों ने तो दुनिया को डुबो ही डाला था. उस देश ने बम गिराए वो उसके साथ था. वो मानता था कि इस धरती पर जीने का अधिकार बीएस उसे ही है जो सबल है. वो मानता था कि क्रांतियां तो सिर्फ़ कमज़ोर ही करते हैं ताकतवर तो सत्ता में रहते हैं. वो उस विजयी देश को सभी देशों का बाप कहता था. लेकिन उस व ...…
 
वो सोचता था भला हुआ जो एक नई सोच की विजय नहीं हुई वरना इन क्रांतिकारियों ने तो दुनिया को डुबो ही डाला था. उस देश ने बम गिराए वो उसके साथ था. वो मानता था कि इस धरती पर जीने का अधिकार बीएस उसे ही है जो सबल है. वो मानता था कि क्रांतियां तो सिर्फ़ कमज़ोर ही करते हैं ताकतवर तो सत्ता में रहते हैं. वो उस विजयी देश को सभी देशों का बाप कहता था. लेकिन उस व ...…
 
उस छटी सी मक्खी का नाम था ललमुनिया, नाम बड़ा प्यारा था माँ प्यार से उसे लाली कहती थी. जवानी के दिनों में बहुत सुन्दर और जोशीली थी. अब उसे अपना गांव अच्छा नहीं लगता था उसके मन में दिल्ली की चकाचौंध का सपना था. उसने पंख फैलाए और आ गई दिल्ली. वो पिज़ा हट में जाकर विज्ञापन में दिखी उस लिसलिसी सी चीज़ का स्वाद लेना चाहती थी. वो अन्दर पहुची ही थी कि अचा ...…
 
खोल दो पट्टी अपनी आँखों से गांधारी के महज़ आँखे खोल देने भर से कोई देख पाएगा ये तुम्हारी धारणा हो सकती है किन्तु सत्य नहीं
 
रात को उदास देखें / चाँद को निरास देखें / तुम्हें न जो पास देखें / आओ पास आओ ना / रूप रंग मान दे दें / जी का ये मकान दे दें / मांग लो लजाओ ना | आज सुनिए इब्ने इंशा को
 
व्यंग्य लेखन में परसाई के पास अपनी अलग ही स्याही थी | व्यवस्था के नासूर से रिसते मवाद की गन्ध को परसाई ने ख़ूब पकड़ा है|
 
हम समाज से चाहते क्या हैं और हमें मिलता क्या है इसी की बानगी पेश करती है विरेन डंगवाल की ये कविता
 
सारी दुनिया तरक्की करती जा रही है और हम आज़ादी के सात दशक बाद भी हिन्दू मुस्लिम के झगड़े में फंसे हुए हैं.
 
आज कि महफ़िल में हम पढ़ रहे हैं कवि दुष्यन्त कुमार की कुछ रचनाएं. दुष्यन्त शायद पहले ऐसे कवि हैं जो ग़ज़लों को दरबारों दीवानों से निकाल कर आम लोगों के पास चाय कि टपरी तक ले आए.
 
जानिसार अख्तर की ग़ज़लें, आपका हमारा दिल और हाथ में गर्म चाय की प्याली. आइये सजाएं मसाला चाय की महफ़िल.
 
मसाला चाय में आज कि महफ़िल सजेगी शायर हबीब जालिब कि रचनाओं के साथ.
 
नियम कायदों को तोड़ कर दुनिया को आँख दिखा कर शायरी करने वाले जॉन एलिया को सुनते हैं आज की मसाला चाय में
 
मसाला चाय कि आज कि महफ़िल में पढेंगे शायर मयंक सक्सेना की कविता 'हवा रुकने के बाद'. मयंक कि ये कविता हमें आगाह भी करती है और सच का आईना भी दिखाती है.
 
घटनाओं को अनदेखा करने की ही आदत के चलते आज हमें देश में ऐसे दिन देखने पद रहे हैं.
 
मसाला चाय की आज की महफ़िल में मेरी कुछ रचनाओं के साथ चलिए अपने महबूब को याद करते हैं.
 
मसाला चाय में आज पढेंगे नज़ीर अकबराबादी की रचना ''आदमीनामा''
 
आज के मसाला चाय में महफ़िल ज़माने के लिए हमने रचनाएं चुनी हैं शायर कतील शिफ़ाई की. कतील की कई रचनाएं सुरों से याराने के बाद इतनी मीठी हो चलीं के अब तक ज़बान पर हैं.
 
हम आश्चर्यजनक रूप से अपनी जिम्मेदारियों से कन्नी काटने लगे हैं देश की परिस्थितियों से जुड़े हर मसले से ये कह कर हम किनारा कर लेते हैं कि 'हमें क्या' हम ये क्यों भूल जाते हैं कि देश ,का नफ़ा नुकसान हमारा भी नफ़ा नुकसान है.
 
प्रेम, इस संसार में मौजूद एक ऐसी भावना जो शाश्वत और सनातन सी लगती है, धारती में जब जीवन पनपा होगा या जब पहले मनुष्य ने जन्म लिया होगा तब कुछ और हो न हो प्रेम का भाव तो ज़रूर रहा होगा.
 
हमने बहुत सारी सुविधाएं विकसित कर ली हैं. अब हमें पैदल चलकर दूरी तय नहीं करनी होती हमारे पास मेट्रो ट्रेन है, हवाई जहाज़ में बैठकर चन्द घंटों में हम समन्दर पार जा सकते हैं एक बटन दबा कर दूर रह रहे मित्र से बतिया सकते हैं लेकिन फिर भी न जाने क्यों समय कि इतनी कमी हो गई है. चौबीसों घंटे पैसों का और समय का रोना रोते रहते हैं. उम्र भर का हासिल हाथ म ...…
 
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