जीवन के द्वार की कुंजी (अध्यात्म उपनिषद - पहला प्रवचन)

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शांति पाठ

ओम्, शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्र्यमा। शं न इंद्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुक्रमः।

नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वादिष्यामि। ऋत वादिष्यामि। सत्यं वादिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारम्।

ओम् शांतिः शांतिः शांतिः।

ओम्, हमारे लिए सूर्य देवता कल्याणकारी हों। वरुण कल्याणकारी हों, अर्यमा कल्याणकारी हों,

इंद्र और बृहस्पति भी कल्याणकारी हों, विष्णु कल्याणकारी हों।

उस ब्रह्म को नमस्कार हो। हे वायु! तुम्हारे लिए नमस्कार है, क्योंकि तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो।

मैं तुम्हें ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूंगा; सत्य और ऋत के नाम से भी कहूंगा।

वे मेरी रक्षा करें। आचार्य की भी रक्षा करें।

ओम् शांतिः शांतिः शांतिः।

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